रांची में घर बनाने से मुश्किल उसका नक्शा पास कराना है, क्योंकि नगर निगम से घर का नक्शा पास कराने में आवेदकों के पसीने छूट जाते हैं। नक्शा पास में देरी को लेकर दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने नगर निगम से वर्ष 2023 से अब तक का डेटा मांगा है। अदालत ने पूछा है कि निगम ने 2023 से अब तक कितने भवनों का नक्शा डीम्ड (स्वत:) स्वीकृत किया है। अगले माह इस मामले पर विस्तृत सुनवाई होगी। कोर्ट के इस निर्देश के बाद नगर निगम के अफसरों ने स्वत: स्वीकृत नक्शा की फाइल तलाशना शुरू कर दिया है। वर्ष 2016 से पहले सभी नक्शा ऑफलाइन ही पास होते थे। इसलिए ऑफलाइन स्वीकृत नक्शों की फाइल भी खंगाली जा रही है। हालांकि, निगम सूत्रों ने बताया कि सच्चाई यह है कि निगम को वर्ष 2010 में नक्शा पास करने का अधिकार मिला था। उस समय से अब तक निगम ने एक भी डीम्ड नक्शा स्वीकृत नहीं किया है। निगम के अधिकारियों ने बताया कि कितने नक्शे स्वत: पास हुए हैं, इसकी छानबीन की जा रही है। छोटे भवन का नक्शा स्वीकृत करने में भी तीन से चार माह का समय लगता है। जबकि, मध्यप्रदेश में 3000 वर्गफीट तक के भवन का नक्शा स्वत: स्वीकृत हो जाता है। आर्किटेक्ट को भी नक्शा स्वीकृत करने का अधिकार मिला है। हिमाचल प्रदेश में निगम 60 दिन में नक्शा स्वीकृत नहीं करता है तो वह स्वत: स्वीकृत माना जाता है। हमारे ऊपर क्या असर घर बनाने के लिए बैंक से लोन नहीं मिलता। नक्शा पास होने में जितना समय लगेगा, घर बनाने में उतनी ही देरी होगी। नक्शा पास कराने में आवेदक कार्यालयों के चक्कर लगाते हैं, समय व पैसा दोनों बर्बाद होता है। परेशानी को देखते हुए अधिकतर लोग बिना नक्शा के ही घर बनाते हैं, बाद में नगर निगम अवैध निर्माण का केस करता है। स्वत: स्वीकृत नहीं करने की बड़ी वजह रांची में जमीन के कागजात काफी विवादित हैं। मात्र 30% कागजात ही पूरी तरह क्लियर होते हैं। 70% में खतियान, रसीद या अन्य कागजात में समस्या बताई जाती है। इसलिए जांच में ही समय लग जाता है। पहले सात स्तर से होकर नक्शा का आवेदन गुजरता था, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासनिक पदाधिकारी और काउंटर क्लर्क को चैनल से हटा दिया गया है। नक्शा पास करने में पैरवी-पैसा का भी खेल चलता है। इसलिए आवेदनों को लटकाने की प्रवृत्ति बनी है। झारखंड में पहले 60 दिन में ग्रीन चैनल परमिट में स्वत: नक्शा स्वीकृति का प्रावधान था, अब 30 दिन
आर्किटेक्ट सुजीत भगत ने बताया कि झारखंड बिल्डिंग बायलॉज- 2016 के तहत भवन का नक्शा पास करने में पारदर्शिता लाने और आवेदकों को राहत देने का प्रावधान है। 2016 से पहले ग्रीन चैनल परमिट के तहत 60 दिनों मंे स्वत: नक्शा स्वीकृत करने का प्रावधान था। छोटे भवनों का नक्शा स्वीकृत कराने का आवेदन कोई देता है तो निगम को निर्धारित अवधि के अंदर उक्त आवेदन का निपटारा करना है। निर्धारित समय में निपटारा नहीं होता है तो 60 दिन के बाद उस आवेदन को स्वत: स्वीकृत माना जाएगा। लेकिन नया बायलॉज आने के बाद इसकी समय सीमा घटा कर 45 दिन कर दी गई। निगम नक्शा स्वीकृत नहीं करता है तो 45 दिन में नक्शा स्वत: स्वीकृत माना जाएगा। लेकिन राज्य सरकार ने इज ऑफ डूइंग बिजनेस के तहत समय को घटाकर 30 दिन कर दिया। हालांकि नियम बनने के आठ साल बाद भी इसे लागू नहीं किया गया।


