रांची के निशांत कुमार ने एमबीए की पढ़ाई की, बेंगलुरू में जॉब किया और फिर जॉब छोड़कर अपने दो दोस्तों के साथ मछली पालने का सपना देखा। इन्होंने साल 2018 में किंग फिशरीज फार्म्स रातू क्षेत्र में 25 बाई 12 के सीमेंट टैंक से मछली पालन शुरू किया, लेकिन तकनीकी ज्ञान के अभाव में असफल हुए और बिजनेस में काफी नुकसान हुआ। इसके बाद कई जगहों से ट्रेनिंग ली, तकनीक का प्रयोग करते हुए फिर से मछली पालन शुरू किया। आज इस फार्म में रेहु, कतला, ग्रास कार्प, पंगास, मोनोसेक्स तिलापिया, सिंघी, कोई, रूपचंद, अमूर कार्प जैसी लगभग 10 देशी-विदेशी मछलियां पाली जा रही हैं। साथ ही एक्वेरियम में रखी जाने वाली मछलियां भी यहां पाली जा रही हैं। लोकल के अलावा बिहार और छत्तीसगढ़ में भी इन मछलियों की मांग है। वर्तमान में इनका यह फार्म पहला कमर्शियल फिश फार्म बन गया है। हर साल 200 टन मछलियों का यहां उत्पादन हो रहा है। निशांत बताते हैं कि यह सेक्टर ऑर्गनाइज नहीं है। इनके साथ 10 लोग प्रत्यक्ष और लगभग 300 लोग अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं। मछली पालन की सबसे बड़ी चुनौती मौसम की होती है। जिस तरह से मौसम में आए दिन बदलाव होते रहते हैं, इससे असर पड़ता है। इसके अलावा इसका कोई फिक्स प्राइस नहीं है। फार्म एक्वा टूरिज्म को भी मिल रहा बढ़ावा यह फार्म एक्वा टूरिज्म को भी बढ़ावा दे रहा है। फार्म से सटे पार्क में घूमने आए लोग यहां पाली जा रही मछलियों को देखने आते हैं। मछली पकड़ने का भी आनंद लेते हैं। फार्मिंग से जुड़े लोग डेमोंस्ट्रेशन विजिट के लिए भी आते हैं। बायो फ्लॉक टैंक… यानि आर्टििफशियल इकोसिस्टम निशांत ने बताया कि अभी पांच पद्धतियों से यहां फिश फार्मिंग की जा रही है। साल 2019 में 24 बायो फ्लॉक टैंक का निर्माण कराया गया। 15 हजार लीटर पानी वाले इस टैंक में आर्टिफिशियल इकोसिस्टम तैयार किया जाता है। जिसमें डिजॉल्व अॉक्सीजन और अच्छी किस्म के बैक्टीरिया डाले जाते हैं, ताकि पानी की गुणवत्ता बनी रहे। साथ ही रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (आरएएस) में सवा लाख लीटर क्षमता वाले 8 टैंकों में मछली पालन किया जा रहा है। टैंक में मछलियों को चारा खिलाते निशांत और फार्म में बने टैंक। सफेद कवर वाले आठ बायो फ्लॉक टैंकों में बड़ी मछलियां पाली जाती हैं।


