एम्स भोपाल में जरूरी जांचें बंद, इलाज अटका:​​​​​​​भर्ती मरीज सबसे ज्यादा परेशान… डॉक्टरों को बाहर से जांच ना कराने के निर्देश, अंदर सुविधा नहीं

देश के सबसे भरोसेमंद स्वास्थ्य संस्थानों में गिने जाने वाले एम्स भोपाल में इन दिनों मरीज इलाज से पहले ही परेशान हो रहे हैं। वजह है कई बेहद जरूरी जांचों का बंद होना। हालात ऐसे हैं कि डॉक्टर जांच लिख रहे हैं, लेकिन लैब से मरीजों को सीधा जवाब मिल रहा है कि यह जांच फिलहाल बंद है। ब्लड कल्चर, यूरीन कल्चर, हेपेटाइटिस-सी, एएसओ टेस्ट, आरएच फैक्टर, आरएस फैक्टर और एच1-बीएसी जैसी जांचें उपलब्ध न होने से इलाज की पूरी प्रक्रिया लड़खड़ा गई है। जिससे रोजाना एम्स में आने वाले 3 हजार से ज्यादा मरीज परेशान हो रहे हैं। वहीं, सबसे ज्यादा परेशानी उन मरीजों को हो रही है जो अस्पताल में भर्ती हैं। दरअसल, भर्ती मरीजों की जांच बाहर से कराने पर रोक है। ऐसे में डॉक्टर सर्जरी से पहले उनकी जांच बहार से नहीं करा पा रहे हैं। वहीं, अंदर सुविधा ही नहीं हैं। इन मरीजों में सबसे बड़ी संख्या गर्भवती महिलाओं, किडनी और लिवर मरीजों के साथ इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे लोगों की है। ओपीडी में आने वाले मरीज निजी लैब के भरोसे
एम्स के बाहर कई बड़े-बड़े निजी सेंटर खुले हुए हैं। जहां ब्राॅन्डिंग इस तरह की जा रही है, जैसे वो एम्स का ही हिस्सा हो। हालांकि, एम्स में जांच ना होने से ओपीडी में आने वाले मरीजों को मजबूरन इन्हीं सेंटर में महंगी जांच करानी पड़ रही है। सिटी स्कैन और एमआरआई की वेटिंग ऐसी की खत्म नहीं होती
एम्स भोपाल में ओपीडी मरीजों और कम गंभीर मरीजों को सिटी स्कैन और एमआरआई जांच के लिए 3 से 6 माह बाद की डेट दी जा रही है। कई बार यह डेट इससे भी आगे की होती हैं। प्रबंधन का इस मामले में तर्क है कि जांच के लिए एक-एक सीटी और एमआरआई की मशीन है। वहीं, मरीजों का लोड इतना है कि यदि 4-4 मशीनें भी लगा दी जाएं तो कम पड़ जाएं। ऐसे में अति गंभीर मरीजों को प्राथमिक्ता दी जाती है। जिससे समय पर इलाज मुहैया करा कर उनकी जांच बचाई जा सके। PET सिटी स्कैन के लिए निजी ही एक विकल्प
एम्स भोपाल करीब 6 माह पहले तक मरीजों की PET सिटी स्कैन जांच MOU के तहत एक निजी एजेंसी से कराई जा रही थी, लेकिन बाद में यह समझौता भी तोड़ दिया गया। वहीं, दूसरी तरफ संस्थान में रेडियोलॉजी का नया सेटअप तैयार हो रहा है। जिसमें यह जांच शुरू की जाएगी। इसके अलावा यहां गामा नाइफ की सुविधा भी होगी। जब तक यह सेंटर शुरू नहीं होता है तब तक मरीजों को इनके लिए निजी में 18 से 20 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। डॉक्टर लिख रहे जांच, लैब कर रही मना
एम्स भोपाल में इलाज की पहली कड़ी होती है सटीक जांच। लेकिन पिछले कुछ समय से मरीजों को बार-बार यह सुनने को मिल रहा है कि जरूरी ब्लड टेस्ट फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं। हेपेटाइटिस-सी, एएसओ, आरएच फैक्टर और आरएस फैक्टर जैसी जांचें रूटीन मानी जाती हैं, लेकिन इनके बंद होने से डॉक्टरों की भी परेशानी बढ़ गई है। कई मामलों में इलाज आगे बढ़ाने से पहले जांच रिपोर्ट अनिवार्य होती है, ऐसे में डॉक्टर भी असमंजस में हैं कि बिना पुख्ता रिपोर्ट इलाज कैसे शुरू किया जाए। वहीं, एम्स के कई डॉक्टर जिला अस्पताल में मौजूद इमेजिंग जांच की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करते हैं। उनका मानना है कि रिपोर्ट की क्वालिटी खराब होती है। ऐसे में मरीजों के सामने में लंबा इंतजार करने या निजी सेंटर से जांच कराने के दो विकल्प बचते हैं। गर्भवती महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर
इस संकट की सबसे बड़ी मार गर्भवती महिलाओं पर पड़ रही है। प्रेग्नेंसी के दौरान आरएच फैक्टर, एचआईवी और हेपेटाइटिस-सी जैसी जांचें बेहद जरूरी होती हैं। आरएच फैक्टर से यह तय होता है कि गर्भावस्था सामान्य है या हाई-रिस्क। जांच न होने से डॉक्टरों को समय रहते खतरे का अंदाजा नहीं लग पा रहा। वहीं, एचआईवी और हेपेटाइटिस-सी की जांच न होने से मां के साथ-साथ होने वाले बच्चे की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मजबूरी में महिलाओं को बाहर निजी लैब में जांच करानी पड़ रही है, जहां एक-एक टेस्ट के लिए सैकड़ों से हजारों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। किडनी मरीजों का इलाज अटका
दूसरा सबसे ज्यादा प्रभावित वर्ग किडनी मरीजों का है, खासकर वे जो डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया में हैं। इन मरीजों के लिए हेपेटाइटिस-सी और एचआईवी की जांच अनिवार्य होती है। बिना रिपोर्ट डायलिसिस का शेड्यूल बिगड़ रहा है और कई मरीजों की ट्रांसप्लांट फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। कुछ मरीजों का कहना है कि उन्हें हर बार निजी लैब में जांच कराकर रिपोर्ट लानी पड़ रही है, जिससे इलाज के साथ-साथ खर्च भी बढ़ता जा रहा है। लिवर और ब्लड डिसऑर्डर मरीज भी परेशान
लिवर की बीमारी और ब्लड डिसऑर्डर से जूझ रहे मरीजों के लिए भी यह स्थिति गंभीर है। हेपेटाइटिस-सी जैसी जांचों से ही बीमारी की गंभीरता और दवाओं की दिशा तय होती है। जांच न होने से इलाज में देरी हो रही है, जिससे बीमारी के बढ़ने का खतरा बना हुआ है। इसके अलावा लंबे समय से बुखार, जोड़ों के दर्द, रूमैटिक फीवर और ऑटो-इम्यून बीमारियों से पीड़ित मरीज भी परेशान हैं। एएसओ और आरएस फैक्टर जैसी जांचें न होने से डॉक्टरों को कई मामलों में अनुमान के आधार पर इलाज करना पड़ रहा है। गरीब और दूरदराज से आए मरीजों के लिए यह सीधा आर्थिक झटका है। एक मरीज दीपक का कहना है कि वे इलाज के लिए तो एम्स आ गए, लेकिन जांच के लिए शहर की अलग-अलग लैब के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। इससे समय भी खराब हो रहा है और इलाज में देरी भी।

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