बस्तर यानी नक्सलवाद और दहशत। दशकों तक इस अभिशाप के साये में जीता रहा बस्तर अब बढ़ते पर्यटन, हाईटेक होम-स्टे, कयाकिंग और बैम्बू राफ्टिंग जैसे प्रयोग के साथ अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। इन्हीं परिवर्तनों के बीच चर्चा में है जगदलपुर का अनूठा ‘कैफे पंडुम’। इसकी खूबसूरत बनावट, विशिष्ट खान-पान से अलग जो बात इसे खास बनाती है, वह हैं यहां काम कर रहे लोग। इनमें कभी जंगलों में हथियार उठाने वाले पूर्व नक्सली भी हैं, तो वहीं हिंसा से प्रभावित वे युवा भी, जिन्हें जंगल छोड़कर शहर के दड़बेनुमा कमरों में जीवन शुरू करना पड़ा। पहले ये 3 तस्वीरें देखिए… अब पढ़िए पंडुम कैफे के बारे में… पंडुम कैफे के 24 में से 15 कर्मचारी ऐसे ही पृष्ठभूमि से आते हैं। इनमें 7 आत्मसमर्पित नक्सली और 8 हिंसा-पीड़ित युवा हैं। ये 45–60 दिन के प्रशिक्षण के बाद नई जिंदगी की शुरुआत कर रहे हैं। सभी को 10 से 12 हजार वेतन मिल रहा है। गोंडी भाषा में ‘पंडुम’ का अर्थ होता है उत्सव। यह कैफे नक्सलवाद से मुक्ति का प्रतीक बनता जा रहा है। बस्तर पुलिस-प्रशासन की पहल पर रायपुर के नुक्कड़ कैफे मॉडल से जुड़े प्रियांक पटेल और तुपेश चंद्राकर ने इसे आकार दिया। यहां कभी हिंसा के दो छोर पर खड़े लोग आज ऑर्डर लेने, सर्विंग करने, किचन में कुकिंग से लेकर मॉकटेल काउंटर संभालते हुए अतीत नहीं, बल्कि साझा भविष्य चुन रहे हैं। नुक्कड़ भी है अनूठा छत्तीसगढ़ में नुक्कड़ कैफे का यह छठवां अलग प्रयोग है। आइटियन युवाओं ने इस कैफे चेन को 2013 में शुरू किया था। इसे ट्रांसजेंडर्स, श्रवणबाधित, दिव्यांग युवा, मानव तस्करी से बचे लोगों को काम देकर आत्मनिर्भर बनाने के लिए पहचाना जाता है। अब पढ़िए नक्सल सरेंडर युवा और यहां काम करने वाले कर्मचारियों ने क्या क्या कहा ?


