ऑपरेशन सारथी:पहचानने के लिए पुराने साथियों को लेकर घूम रही फोर्स, क्योंकि जंगल छोड़ गांव में छिप रहे नक्सली

नक्सलवाद को खत्म करने के लिए बस्तर में अब ​आखिरी ऑपरेशन सारथी चलाया जा रहा है। आत्मसमर्पित नक्सलियों को गोपनीय सैनिक बनाकर उन्हें अपने साथ फोर्स लेकर घूम रही है। जो भी बचे हुए नक्सली हैं, अब उनकी पहचान इनसे करवाई जा रही है। क्योंकि ऐसा इनपुट है कि लगातार जंगलों में फोर्स के बढ़ने से नक्सली अब वहां से भागकर गांव में छिप रहे हैं। ऐसे में जंगल से लेकर गांव तक उनके ही पुराने साथी बंदूक लेकर अब फोर्स के साथ हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की डेडलाइन यानी 31 मार्च में अब सिर्फ 60 दिन ही बचे हैं। दैनिक भास्कर की टीम ने बस्तर में जंगलों में सात दिन गुजारकर पहली बार 360 डिग्री पर नक्सलवाद की खबर की। जिसमें यह निकला कि अब केवल 10 टॉप लीडर ही बस्तर में बचे हैं। 80 गांव नक्सल प्रभावित हैं, जिसमें करीब 250 सहयोगी और 150 बंदूकधारी नक्सली सक्रिय हैं। इनके खत्म होने या आत्मसमर्पण के बाद ही बस्तर नक्सलमुक्त हो पाएगा। कुछ यूं सिमट रहा नक्सलवाद: छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के समय बस्तर में नक्सल प्रभावित क्षेत्र करीब 22,000 वर्ग किलोमीटर था। जो घने जंगल और उससे सटे इलाकों में फैला था। अब यह लगभग 400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक सीमित रह गया है। इसमें सुकमा, नारायणपुर, बीजापुर, कांकेर, दंतेवाड़ा के अंतरराज्यीय और अंतर-जिला सीमावर्ती इलाकों तक सीमित है। बस्तर रेंज में कुल 1,885 ग्राम पंचायतों में से 95 प्रतिशत अब सरकारी प्रशासनिक तंत्र की पूर्ण पहुंच में आ गईं हैं। केवल 80 से कम ग्राम पंचायतें नक्सल प्रभावित हैं।
कोंडागांव भी नक्सलमुक्त
बस्तर के दो जिले जगदलपुर और कोंडागांव पूरी तरह से नक्सलमुक्त हो चुके हैं। इन दोनों जिलों में औपचारिक डी-क्लासिफिकेशन भी हो चुका है। अब बचे हुए गांवाें की औपचारिक घोषणा जिला-स्तरीय सत्यापन एवं प्रशासनिक अधिसूचनाओं के बाद जारी होगी। सुरक्षा एजेंसियां और जिला प्रशासन तेजी से क्लियरेंस दे रहा है।
तय समय में खत्म नक्सलवाद
नक्सलवाद अपनी तय समय सीमा में खत्म हो जाएगा। हम कामयाबी की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। अब कुछ ही गांव तक नक्सल सिमटकर रह गया है। जो बचे हुए हैं उन्हें आत्मसमर्पण के लिए कहा जा रहा है। उनके साथियों की जिंदगी बदल रही है तो वे भी अपनी राह बदल देंगे।
-विजय शर्मा, गृह मंत्री

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