कटारिया बोले- मेरा भाग्य तगड़ा था इसलिए राज्यपाल बन गया:महामहिम का पद ऐसा लगता है किसी अलग जात का हूं, प्रोटोकॉल वाले तंग करते हैं

कर्मयोगी चंपालाल सालेचा के 75 अमिबिंदु पुस्तक का विमोचन मंगलवार को जोधपुर के डॉ.SN मेडिकल कॉलेज सभागार में किया गया। इस दौरान पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत सहित कई नेता भी उपस्थित रहे। इस दौरान राज्यपाल कटारिया ने कहा- उनका चंपालाल सालेचा से उदयपुर में शिक्षा के समय से जुड़ाव हुआ। तब से उनके साथ पारिवारिक संबंध स्थापित हुए। इस दौरान संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि वो भी उनके जैसे एक कार्यकर्ता ही थे, लेकिन मेरा भाग्य तगड़ा था, इसलिए महामहिम बन गया। केवल इस पद के कारण मेरी गरिमा नहीं बढ़ेगी, मेरे कर्मों के आधार पर मेरी गरिमा बढ़ेगी। राज्यपाल ने ये भी कहा ये महामहिम का पद क्या होता है, दुनिया से अलग। ऐसा लगता है में किसी अलग जात का हूं। सामान्यतः मुझे ये अच्छा नहीं लगता है, लेकिन हमारे प्रोटोकॉल वाले तंग करते हैं। उन्होंने कहा- मैं सोचता हूं कि आप सब और मैं अपने आप को ऐसे व्यक्तियों के जीवन को लिखना और पढ़ना आगे ले जाना बहुत बड़ी बात है। यदि ये देश जिंदा रहा तो गीता और रामायण के कारण। लोग मर गए, सर कट गए, लेकिन देश मिटा नहीं। संस्कृति मिटी नहीं। जीवन क्या होता है, करना क्या है वो प्रश्न उसमें भरा हुआ था। ये चीजें आने वाली पीढ़ी को राह दिखाने का तरीका है। उन्होंने कहा- राष्ट्रपति शासन के समय निकले आदेश की ट्रस्ट की सारी संपत्ति सरकार की होगी। उस समय सालेचा ने सभी धार्मिक संगठनों को एक मंच पर लाकर खड़ा किया। जिसके चलते सरकार को घुटने टेकने पड़े। उन्होंने चंपालाल सालेचा के साथ अपने जुड़ाव को बताया। कहा- जब वो राजनीति में नहीं था, उससे पहले ही उनसे जुड़ने का मौका मिला। उनमें इतनी प्रतिभाएं एक साथ आ जाना कोई उनके माता पिता का श्रेष्ठ कर्म था। उनके देश के उस समय के प्रमुख सभी संतों से मिलना जुलना था। उन्होंने जनसंघ की स्थापना से लेकर अंतिम दम तक केवल जनसेवा और व्यक्ति जिस प्रकार से काम करें इस पर काम किया। उन्होंने कहा कि इस किताब में उनके लिखे 75 अमृत विचार से आने वाले पीढ़ी को ये जानने का मौका मिलेगा कि वो क्या सोचते थे और क्या करते थे। राज्यपाल ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन काल में इतने काम कर दिए जितना कोई सोच भी नहीं सकता, जबकि हमने भी इतने साल राजनीति में गुजार दिए, लेकिन जनता का काम करने का दिमाग में ही नहीं आता है। दिमाग में ही आता है कि होगा क्या। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल भाषण और लिखकर नहीं, जीवन में प्रत्यक्ष प्रकटीकरण करने का काम किया। लिख देना, साहित्य की रचना करना अलग बात है, लेकिन अपने जीवन में घटित घटनाओं को लिखते हुए उसे साहित्य में प्रणीत करना ये अंतर प्रेरणा से ही ही सकता है, हमें इतने साल हो गए दो पेज जिंदगी का नहीं लिख सकें।

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