राज्य सरकार द्वारा सैकड़ों पशु चिकित्सालय संचालित होने के बावजूद करौली शहर के मेला दरवाजा क्षेत्र में स्थित पशु चिकित्सालय के पास भी सड़क दुर्घटनाओं में घायल गोवंश को समय पर उपचार नहीं मिल पाता। ऐसे में करौली के युवाओं द्वारा संचालित श्रीराम गौ सेवा संस्थान पिछले 6-7 वर्षों से यह जिम्मेदारी निभा रहा है। वर्तमान में यह संस्थान चटीकना मोहल्ला स्थित भगवती लाल पाराशर बालकदास मंदिर के पास संचालित है। इससे पहले, टीम तांबे की टोरी और दुर्गा टॉकीज क्षेत्र के एक निजी परिसर से गौ सेवा कर रही थी। संस्थान ने सैकड़ों घायल और बीमार गायों का प्राथमिक उपचार कर उन्हें करौली-धौलपुर रोड स्थित ठेकरा गोशाला भेजा है, जहां उन्हें नया जीवन मिला। लम्पी वायरस महामारी के दौरान भी संस्थान ने सैकड़ों संक्रमित गोवंश का उपचार कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संस्थान की सबसे बड़ी ताकत 50 से अधिक युवाओं की एक समर्पित टीम है, जो 24 घंटे निःशुल्क सेवा में जुटी रहती है। संस्थान के अध्यक्ष राहुल सिंह जादौन ने बताया कि सड़कों पर तड़पते गोवंश की पीड़ा ने ही युवाओं को गौ सेवा के लिए प्रेरित किया। सूचना मिलते ही टीम के सदस्य अपने कार्य छोड़कर मौके पर पहुंच जाते हैं। यह सेवा समाज से मिलने वाले अनाज, दवाइयों और आर्थिक सहयोग से निरंतर जारी है। तीन वर्ष पूर्व संस्थान का पंजीकरण होने के बाद कार्य और अधिक संगठित हुआ है। पशुपालन विभाग भी दवाइयों के रूप में संस्थान को सहयोग प्रदान करता है। संस्थान के सक्रिय सदस्य नीरज शुक्ला ने बताया कि अब तक 500 से 1000 गोवंश का उपचार कर उन्हें जीवनदान दिया जा चुका है। वर्तमान में संस्थान में 30-35 गोवंश रखने की क्षमता है, लेकिन जगह कम पड़ रही है। बारिश के दौरान अस्थायी शेड लगाकर गोवंश को सुरक्षित रखा जाता है। बीमार, दुर्घटनाग्रस्त, प्रसूता और आक्रामक पशुओं के लिए अलग-अलग सेक्शन की आवश्यकता है। इसके लिए संस्थान द्वारा सरकार से भूमि आवंटन की मांग की जा रही है। वेटरनरी कंपाउंडर गौरव सैनी ने बताया कि यहां प्राथमिक उपचार के साथ सर्जरी और पोस्टमॉर्टम तक की सुविधा उपलब्ध है। कई मामलों में गायों के पेट से पॉलिथीन, थर्मोकोल और फॉइल निकाले गए हैं, जो उनकी मौत का कारण बनते हैं। संस्थान ने सरकार से शहर में पॉलिथीन व फॉइल प्लेटों पर सख्त प्रतिबंध और गोवंश के लिए स्थायी शेड व उपचार केंद्र हेतु भूमि आवंटन की मांग की है। श्रीराम गौ सेवा संस्थान आज करौली में मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक बन चुका है, जो पूरे जिले के लिए प्रेरणास्रोत है।


