करौली का ऐतिहासिक शिवरात्रि पशु मेला, जो रियासतकाल से इस क्षेत्र की पहचान रहा है, अब अपनी पुरानी रौनक खोता जा रहा है। कभी पशुधन व्यापार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाने वाला यह मेला आधुनिक खेती, मशीनीकरण और नीतिगत बदलावों के कारण सिमट गया है। 1 फरवरी से शुरू हुए इस पारंपरिक मेले में अब गौवंश की मौजूदगी लगभग शून्य है, जबकि यह मुख्य रूप से ऊंट प्रधान मेला बनता जा रहा है। प्रदेश के प्रमुख पशु मेलों में से एक रहा करौली का शिवरात्रि पशु मेला इस वर्ष 1 फरवरी से मेला गेट के बाहर स्थित मैदान में आयोजित किया जा रहा है। मेले के उद्घाटन से पहले ही पशुपालकों की आवक शुरू हो गई थी और अब तक लगभग 75 ऊंट मेले में पहुंच चुके हैं। फिलहाल मेला मैदान में ऊंटों की ही अधिक चहल-पहल दिखाई दे रही है। इतिहासकारों और पशुपालकों के अनुसार, यह मेला लगभग 200 से 250 वर्ष पुराना है। रियासतकाल में इसका आयोजन राजा-महाराजाओं द्वारा किया जाता था। बाद में करौली नगर पालिका और वर्ष 1964 से पशुपालन विभाग द्वारा इसे नियमित रूप से आयोजित किया जा रहा है। पहले यह मेला एक से डेढ़ माह तक चलता था, लेकिन पशुओं की घटती संख्या के कारण अब इसे केवल 8 दिनों (1 फरवरी से 8 फरवरी तक) के लिए सीमित कर दिया गया है।
बीते दशकों में यह मेला गौवंश, भैंसवंश, उष्ट्रवंश, अश्ववंश और बकरा-बकरी सहित हजारों पशुओं के व्यापार का एक बड़ा केंद्र था। एक समय इस मेले में 14 से 15 हजार तक पशुओं की आवक होती थी। हालांकि, खेती में ट्रैक्टरों और आधुनिक मशीनों के बढ़ते उपयोग से बैलों तथा अन्य पारंपरिक पशुओं की उपयोगिता कम होती चली गई, जिसका सीधा असर मेले पर पड़ा। इसके अतिरिक्त, पिछले तीन वर्षों से छोटे गौवंश की खरीद-बिक्री और उन्हें राज्य से बाहर ले जाने पर लगे प्रतिबंधों के कारण मेले में गौवंश की संख्या पूरी तरह से शून्य हो गई है। वहीं, ऊंट वंश की बिक्री में वृद्धि देखी जा रही है। इस साल मेले में 400 से 500 ऊंटों के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।


