कवियों की चप्पलें चोरी हो जाया करती थीं!:आजकल कविताएं चोरी होने लगीं; शर्मिंदा उसे होना पड़ता है जिसकी चुराई गई है

समय बदल गया है। बचपन में गांव में नौटंकियां होती थीं, जिनमें नारी पात्रों की भूमिका भी लड़के ही निभाते थे। नौटंकियों को मनोरंजक बनाए रखने के लिए उनमें नृत्य भी होता था। नौटंकी की कहानी भले ही हास्य प्रधान हो लेकिन उसमें लड़के नृत्यांगना की तरह नाचते थे। एक दिन किसी ने शरारत कर दी। ऐसे ही एक अलौकिक नृत्य के बीच किसी ने घोषणा करवा दी कि ‘प्रसिद्ध वैद्य श्री बालकिशन जी के सुपुत्र सुरेंद्र शर्मा ने इस नृत्य से प्रसन्न होकर पांच रुपए का इनाम दिया है।’ बात पूरे गांव में फैल गई। मुझे पता ही नहीं था कि मैं कब, किसके नृत्य से प्रसन्न हुआ और कब मैंने 5 रुपए का इनाम दे दिए। पर मुझे पता न होने से क्या फर्क पड़ता था, पिताजी को तो पता चल ही गया। वे बहुत निराश हुए। बोले, ‘पहले ही तेरा ब्याह नहीं हो पा रहा है, अब सबको ये और पता चल गया कि तू लड़कों के डांस पर पैसे लुटाने लगा है।’ मेरे इस घोर अपराध के लिए किसी ने मेरे पिताजी को चिट्ठी भी लिखी, जिसके कारण मेरे पिताजी मुझसे और भी अधिक निराश हो गए। तरह-तरह की लीलाओं के लिए जो नाटक मंडली आती थी, उसके कलाकारों के भोजन के लिए गांव के अलग-अलग घरों से न्योता भेजा जाता था। जिसके यहां मंडली का भोजन होता था, उसके घर पर पूरी मंडली उस लीला से जुड़े कपड़े पहनकर जीमने जाते थे। अक्सर अगले दिन का न्योता पहले दिन का मंचन शुरू होने से पहले तक मिल जाता था। एक दिन न्योता नहीं मिला और मंचन शुरू हो गया। उस दिन नाटक में विलाप का कोई दृश्य था अनाउंसर बोल रहा था, ‘कल के भोजन का न्योता अभी तक नहीं मिला है। कलाकार के इससे भी बढ़िया विलाप कल देखने को मिलेगा, जब दोपहर का भोजन नहीं मिलेगा।’ मंच पर पात्र की प्रेमिका खो गई थी और अनाउंसर भोजन खोज रहा था। बेचारे मंडली वालों की कमाई वह रेजगारी थी, जो मंचन में लुटाई जाती थी। गांव में जिसके पास जो सबसे घिसे-पिटे सिक्के होते थे, वो वहां लुटा जाता था। यही कीमत बेचारे कलाकारों की आमदनी थी। बाद में जब मैं कवि-सम्मेलनों में जाने लगा तो एक बार कवि-सम्मेलन में से मेरी चप्पल चोरी हो गई। मेरी चप्पल कोई और ले गया और मैं किसी और की चप्पलें पहनकर घर आ गया। उस कवि-सम्मेलन के आयोजक मुगली घुट्टी वाले अरोड़ा जी थे। हमारे घर के बाहर ही उनकी दुकान थी। अगले दिन जब मैं कवि-सम्मेलन से बदली हुई चप्पल पहनकर निकला तो उन्होंने बड़ी हैरत से मेरी ओर देखकर पूछा था, ‘ये चप्पलें तो बहुत शानदार हैं, कितने की खरीदीं?’ मैं उनके पूछने के अंदाज से ही समझ गया कि वे चप्पलें उन्हीं की थीं। मैंने शर्मिंदगी महसूस की। उन दिनों कवि गद्दे पर बैठते थे, इसलिए चप्पलें उतारकर ही मंच पर चढ़ने की परंपरा थी। और चप्पलें उतारकर कवि मंच पर व्यस्त रहता था, इसलिए कवियों की चप्पलें चोरी होने की घटनाएं आम थीं। आज देखता हूं, जिन कवि-सम्मेलनों में कभी चप्पलें चोरी होती थीं, वहां आजकल कविताएं भी चोरी होने लगी हैं और शर्मिंदा उसे होना पड़ता है, जिसकी कविता चुराई गई है, क्योंकि जिसने चुराई है वो तो हाथ में चप्पल लेकर आत्मविश्वास के साथ खड़ा है। ————— ये कॉलम भी पढ़ें राजनीतिक लड़ाकों का युग फिर से लौटेगा:सभी राजनैतिक पार्टियां पहलवानों को टिकट देंगी! लुप्तप्राय दंगल लौटकर आएंगे

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