भास्कर न्यूज | कवर्धा आज महावीर जयंती है। कबीरधाम जिले के पंडरिया से 22 किमी दूर बकेला गांव में घने जंगल के बीच जैन तीर्थ बन रहा है। यहां दसवीं सदी की दुर्लभ प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्व नाथ की है। काले ग्रेनाइट से बनी यह प्रतिमा 127 सेमी ऊंची है। प्रभु ध्यान मुद्रा में आसनस्थ हैं। सिर पर जटाजूट, फणिनाग का छत्र और दोनों ओर चंवर हिलाती गणिकाएं हैं। यह प्रतिमा श्री बकेला पार्श्व नाथ के नाम से प्रसिद्ध हो गई है। राष्ट्रपति से पुरस्कृत शिक्षक व पुराविद् आदित्य श्रीवास्तव बताते हैं कि इस प्रतिमा की जानकारी पंडरिया निवासी सहसमल लोढ़ा को सूरत से आए एक पत्र से मिली थी। पत्र में लिखा था कि पंडरिया के पास एक सुरम्य तालाब के किनारे पार्श्व नाथ भगवान की भव्य प्रतिमा है। इसके बाद जैन श्रीसंघ के लोगों ने स्थल का भ्रमण किया। दर्शन कर धन्य हुए। भगवान श्री पार्श्व नाथ क्षमा, समता व दया के प्रतीक: पुराविद् आदित्य श्रीवास्तव ने बताया कि भगवान श्री पार्श्व नाथ क्षमा, समता, दया, सहिष्णुता और धैर्य के प्रतीक हैं। उनका प्रतीक चिह्न सर्प है। चैत्यवृक्ष धव, यक्ष मातंग और यक्षिणी कुष्माडी हैं। शरीर का वर्ण नीला है। बकेला में नवकार धाम के रूप में जैन तीर्थ का विकास इस क्षेत्र का सौभाग्य है। क्षेत्रीय विधायक फूलचंद लोढ़ा और तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्रकुमार सखलेचा के प्रयास से पुरातत्व विभाग ने यह प्रतिमा जैन श्रीसंघ पंडरिया को सौंपी। 1979 में इसे पंडरिया के जैन मंदिर में स्थापित किया गया। पुराविद् श्रीवास्तव ने बताया कि 1982 में साध्वी निपुणाश्री के आगमन से क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियां बढ़ीं। उनके सानिध्य में 15 से 17 दिसंबर 1987 को श्री पार्श्व नाथ जन्म कल्याण महोत्सव हुआ। इसके बाद मुनि मनोज्ञसागर के आगमन से बकेला तीर्थ के विकास के द्वार खुले। पुराविद् आदित्य श्रीवास्तव ने बताया कि भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। उनका जन्म 599 ईसा पूर्व चैत्र शुक्ल तेरस को वैशाली गणराज्य के कुण्डग्राम में हुआ। पिता का नाम राजा सिद्धार्थ और माता का नाम रानी त्रिशला था। जन्म के बाद राज्य में उन्नति हुई, इसलिए उनका नाम वर्धमान रखा गया। 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्व नाथ के निर्वाण के 188 वर्ष बाद महावीर का जन्म हुआ। उनका जीवन त्याग, तपस्या और अहिंसा का प्रतीक बना।


