मप्र हाई कोर्ट ने सरकारी नौकरी में ट्रांसफर, प्रमोशन, पेंशन सहित अन्य मामलों के लिए सरकार को अपना इन-हाउस सिस्टम बनाने की सलाह दी है। इस सलाह के पीछे कई ऐसे केस हैं जिनमें कर्मचारियों और उनके परिजनों को अनावश्यक परेशानी झेलनी पड़ी। ऐसा ही एक मामला मप्र हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एम.डब्ल्यू. देव से जुड़ा है। उनकी पत्नी निर्मला देवी को फैमिली पेंशन के लिए 87 वर्ष की उम्र में हाई कोर्ट में याचिका लगानी पड़ी। उन्हें 80 की उम्र के बाद मिलने वाली अतिरिक्त पेंशन नहीं मिल रही थी। विभाग से हारकर मार्च 2023 में उन्होंने याचिका दायर की। ढाई साल बाद कोर्ट के आदेश पर 26 लाख 79 हजार रुपए दिए गए। 4 जज ऐसे ही मामले सुन रहे हैं: मप्र हाई कोर्ट में सर्विस मैटर्स से जुड़े 50 हजार से अधिक मामले पेंडिंग हैं। जबलपुर में जस्टिस विशाल धगत और जस्टिस मनिंदर सिंह भट्टी, इंदौर में जस्टिस जय कुमार पिल्लई व ग्वालियर में जस्टिस आनंद सिंह बहरावत रोज सर्विस मैटर्स की सुनवाई कर रहे हैं। 391 दिन के वेतन के लिए 19 साल तक कानूनी लड़ाई महिला एवं बाल विकास विभाग में सहायक परियोजना अधिकारी रहीं उषा विनोदिया को नौकरी में महज 391 दिनों के वेतन के लिए हाई कोर्ट में 19 साल कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। इसी तरह एनवीडीए से 2014 में रिटायर हुए गोकुल प्रसाद ने ग्रेच्युटी के करीब 2.50 लाख रुपए के लिए 2015 में हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में याचिका दायर की थी। यह 11 साल बाद भी विचाराधीन है। 2021 में उनका कोरोना से निधन हो गया। परिवार केस लड़ रहा है। पीएचई से रिटायर बलवंत सिंह मंडलोई के वेतन से जुड़े मामले में बिना वजह कानूनी लड़ाई खींचने पर हाई कोर्ट ने विभाग के चीफ इंजीनियर पर 20 हजार रुपए का जुर्माना लगाया।


