क्रिसमस पर जानिए छत्तीसगढ़ के मशूहर गिरजाघरों के बारे में:यहां एशिया की दूसरी सबसे बड़ी चर्च; एक में दफन है टाइम कैप्सूल

दुनियाभर में धूमधाम से क्रिसमस मनाने की तैयारी चल रही है। छत्तीसगढ़ में भी कई चर्च ऐतिहासिक महत्व समेटे हुए है। इसमें से एक जशपुर की चर्च तो एशिया की दूसरी सबसे बड़ी चर्च है। वहीं दुर्ग जिले की एक चर्च में टाइम कैप्सूल दफन है। क्रिसमस के मौके पर प्रदेश के चर्च की कहानी जानिए.. 1. कम्युनिटी क्रिश्चियन चर्च, भिलाई भिलाई सेक्टर-6 का क्रिश्चियन कम्युनटी चर्च 55 साल पुराना है। यह जिले का इकलौता ऐसा चर्च है, जहां टाइम कैप्सूल दफन है। इस चर्च की खास बात यह है कि यहां देश के सभी राज्यों से क्रिश्चियन परिवार के लोग प्रेयर के लिए आते हैं। टाइम कैप्सूल चर्च के अंदर पुलपिट के नीचे दफन है और वहीं पर आराधना की जाती है। 25 दिसंबर यानी क्रिसमस के दिन 1965 को इस चर्च में पहली प्रेयर के साथ यादगार समारोह आयोजित किया गया था। तब से भिलाई और दुर्ग में एक-एक करके 50 से ज्यादा चर्च भवन बन चुके हैं। 2. कुनकुरी महागिरजाघर, जशपुर जशपुर जिले का शहर है कुनकुरी। यहां एशिया का दूसरा सबसे बड़ा चर्च है। इस चर्च को इसकी विशालता के लिए महागिरजाघर भी कहा जाता है। खास बात ये भी है कि सालों पहले जब इस चर्च को बनाया गया तब पहाड़ और जंगलों से ये इलाका घिरा हुआ था। 17 वर्ष में बनकर तैयार हुए महागिरजाघर को आदिवासी मजदूरों ने बनाया था। जशपुर जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर की दूरी पर है। इसकी बनावट बाइबिल में लिखे तथ्यों के आधार पर है। यह विशालकाय भवन केवल एक बिम्ब में टिका हुआ है। 3. बिलासपुर का डिसाइपल्स आफ क्राइस्ट चर्च बिलासपुर के सिविल लाइन स्थित डिसाइपल्स आफ क्राइस्ट चर्च का इतिहास बेहद खास है। बताया जाता है कि, साल 1890 में महज 30 हजार रुपए में इस चर्च का निर्माण पूरा हुआ था। चर्च का निर्माण ब्रिटिश काल में हुआ था। इस चर्च का ढांचा अब भी पुराना है, जिसमें गर्मियों के समय में पंखे तक की जरूरत नहीं पड़ती। 4. बस्तर की लाल चर्च बस्तर के जगदलपुर में भी एक अंग्रेजी हुकूमत के दौर की ऐतिहासिक चर्च है, जिसे ‘लाल चर्च’ के नाम से जाना जाता है। साल 1890 का वो दौर था जब रायपुर से मिशनरी सीबी वार्ड बैलगाड़ी से बस्तर पहुंचे थे। उन्होंने बस्तर के काकतीय वंश के एक राजा से मुलाकात की। राजा ने जगदलपुर में उन्हें जमीन दान की। मिशनरी ने 1890 में ही उस जमीन पर चर्च की नींव रख दी। धीरे-धीरे निर्माण काम शुरू किया गया। खास बात यह रही कि, उस दौर में मिशनरियों ने चर्च बनाने के लिए लाल ईंट, बेल फल, गोंद और चूना का इस्तेमाल किया था। इस चर्च को बनने में करीब 33 साल लग गए थे। मिशनरियों ने इस चर्च को ऐतिहासिक बनाने इस चर्च में सिर्फ एक ही रंग का इस्तेमाल करने का विचार बनाया और लाल रंग का इस्तेमाल करने का निर्णय लिया गया था।

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