मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य निशुल्क दवा योजना (मां) में गड़बड़ी से बचने के लिए इसका काम अब थर्ड पार्टी को सौंपने की तैयारी की जा रही है। राजस्थान मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी की बैठक में इसे लेकर प्रस्ताव लाया जाएगा। मां योजना में गलत फीडिंग के कारण डॉक्यूमेंट मिसमैच होने से पीबीएम हॉस्पिटल के विभिन्न विभागों में 25 से 42 प्रतिशत तक क्लेम रिजेक्ट हो गए थे। इस संबंध में अधीक्षक सहित छह विभागों के एचओडी को सरकार ने नोटिस जारी कर रखे हैं, लेकिन उनके जवाब अब तक तैयार नहीं हो पाए हैं। मां योजना में आगे कोई गड़बड़ी न हो, इसके लिए यह पूरा काम ही थर्ड पार्टी को देने की कवायद की जा रही है। एक ऐसी फर्म को यह काम सौंपा जाएगा, जो मां योजना के तहत लाभार्थियों के रिकॉर्ड को मेंटेन करने के साथ ही डॉक्टरों से जरूरी डॉक्यूमेंट लेकर क्लेम करेगी। पीबीएम प्रशासन का मानना है कि इससे क्लेम रिजेक्शन भी कम होंगे। वर्तमान में मां योजना के तहत पूरा काम पीबीएम के स्तर पर हो रहा है। हॉस्पिटल का स्टाफ ही डॉक्यूमेंट लेकर उसकी फीडिंग और क्लेम का काम देख रहा है। ऐसे में काफी गलतियां भी हो रही हैं। मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी की बैठक 12 फरवरी को प्रस्तावित है। उस बैठक में सोसायटी के अध्यक्ष संभागीय आयुक्त के समक्ष यह काम थर्ड पार्टी को सौंपने का प्रस्ताव रखा जाएगा। पीबीएम अधीक्षक स्तर पर इसका खाका तैयार कर लिया गया है। गौरतलब है कि बीमा कंपनी ने प्रदेश के 28 जिलों में सरकारी अस्पतालों के क्लेम रिजेक्ट किए थे, जिनमें से ज्यादा क्लेम बीकानेर के पीबीएम हॉस्पिटल के हैं। राज्य के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर जिले के प्रभारी मंत्री होने के बावजूद पीबीएम की परफॉर्मेंस पर सवाल खड़े होने लगे हैं। मां योजना में नोटिस : आधे डॉक्टरों ने ही भेजे जवाब मां योजना में गड़बड़ी मिलने पर 42 प्रतिशत तक क्लेम रिजेक्ट हो गए थे। इस वजह से पीबीएम हॉस्पिटल के अधीक्षक सहित छह विभागों के एचओडी को नोटिस जारी किए गए थे, जिनमें से अभी तक आधे ही जवाब भेज पाए हैं। एक-दो से तो जवाब ही तैयार नहीं हो पा रहे हैं। दरअसल क्लेम में दस्तावेजों की कमी के कारण डॉक्टर जवाब नहीं दे पा रहे। मनोरोग विभाग के 25 प्रतिशत, कैंसर सेंटर के 27.43 प्रतिशत, टीबी और चेस्ट के 27.50 प्रतिशत, ईएनटी के 30.31 प्रतिशत, मेडिसिन विभाग के 38.77 प्रतिशत और बच्चा अस्पताल के करीब 42 प्रतिशत क्लेम रिजेक्ट हो गए हैं। इसके कारण मरीजों के भर्ती होने से लेकर छुट्टी करने के दस्तावेज पूरे नहीं होना, ऑपरेशन के दौरान लिया गया फोटो भर्ती के समय लिए फोटो से मैच नहीं होना, प्रोटोकॉल के तहत दस्तावेजीकरण नहीं होना, मरीज का पैकेज बदल जाना, एक्स-रे रिपोर्ट, सीटी-एमआरआई की रिपोर्ट दस्तावेजों में नहीं लगाना आदि हैं। क्या है मामला
सरकारी हॉस्पिटल में मां योजना के तहत भर्ती होने वाले मरीजों के इलाज की राशि बीमा कंपनी देती है। इसके लिए भर्ती मरीजों की डिटेल और डॉक्यूमेंट बीमा कंपनी को भेजे जाते हैं। तमाम डॉक्यूमेंट और जरूरी जानकारी पोर्टल पर अपलोड होने के बाद बीमा कंपनी मरीज के इलाज में खर्च होने वाली राशि इलाज करने वाले सरकारी हॉस्पिटल के राजकीय खाते में ट्रांसफर करती है। कई मामलों में डॉक्यूमेंट और जानकारी अधूरी भेजने के कारण बीमा कंपनी ने क्लेम रद्द कर दिए। इसमें अधीक्षक से लेकर एचओडी, यूनिट हेड, नर्सिंग ऑफिसर और निचले कर्मचारियों की लापरवाही मानी जा रही है। चिकित्सा निदेशालय आयुक्त नरेश गोयल ने पीबीएम अधीक्षक सहित मेंटल हेल्थ, कैंसर, टीबी एंड चेस्ट, ईएनटी और बच्चा अस्पताल के एचओडी/इंचार्ज को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। पेट सीटी स्कैन की जांच भी पीबीएम में ही करने की तैयारी कैंसर रोगियों के पेट सीटी स्कैन की जांच भी पीबीएम हॉस्पिटल परिसर में करने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए जल्दी ही टेंडर जारी होंगे। अधीक्षक डॉ. बीसी घीया ने इसके लिए एक टेक्निकल कमेटी बनाई है। इन-हाउस जांच शुरू करने के लिए फर्म से दस साल का अनुबंध किया जाएगा। दरअसल पेट सीटी स्कैन की जांच आउटसोर्स की हुई है। एक निजी फर्म सालों से काम कर रही है। इसका टेंडर इस साल खत्म हो जाएगा। हालांकि उसकी कार्यप्रणाली विवादों में रही है। पिछले दिनों फर्म के कई क्लेम फर्जी मानते हुए निरस्त किए गए थे। आरजीएचएस योजना के तहत पेश किए गए फर्म के छह माह के बिलों का सत्यापन हुआ था, जिसमें पेट स्कैन के 15 लाख के 206 बिलों में से पांच लाख के 44 बिल दूसरी जांचों के निकले थे। बताया जा रहा है कि ऐसे बिलों की संख्या ज्यादा थी, लेकिन कम बताई गई। दो साल पहले एक पूर्व अधीक्षक के समय बिलों के सत्यापन के लिए बनी कमेटी भी कागजों तक ही सीमित होकर रह गई थी। “राजस्थान मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी की मीटिंग 12 फरवरी को रखी गई है। मां योजना का काम थर्ड पार्टी को देने की योजना है। पेट सीटी की जांच अब इन-हाउस करेंगे।”
डॉ. बीसी घीया,अधीक्षक, पीबीएम हॉस्पिटल


