ख्वाजा साहब के 814वें उर्स का झंडा चढ़ाया, उमडे़ जायरीन:तोप के 25 गोले दाग कर दी सलामी; सुरक्षा के लिए पुलिस के रहे पुख्ता बंदोबस्त

सूफी संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती उर्फ गरीब नवाज के 814वें सालाना उर्स की अनौपचारिक शुरुआत आज दरगाह के बुलंद दरवाजे पर पारंपरिक झंडा रस्म के साथ हो गई। असर की नमाज के बाद लंगरखाने से शुरू हुए झंडे के जुलूस में अकीदतमंद उमड़ पड़े। यह रस्म अदा होने के साथ ही उर्स शुरू हो गया, जो रजब महीने के चांद दिखने पर औपचारिक रूप से प्रारंभ होगा। परंपरा के अनुसार, झंडा चढ़ाने की यह रस्म भीलवाड़ा के गौरी परिवार द्वारा अदा की गई। असर की नमाज अदा होने के बाद गरीब नवाज गेस्ट हाउस से झंडे का जुलूस रवाना हुआ। ढोल-नगाड़ों और सूफियाना कलाम की गूंज के बीच जुलूस लंगरखाना गली, निजाम गेट और शाहजहानी गेट होते हुए बुलंद दरवाजे तक पहुंचा। यहां झंडा चढ़ाए जाने के दौरान 25 तोपों की सलामी दी गई, जिसने वातावरण को और अधिक रूहानी बना दिया। अकीदतमंदों ने फातिहा पढ़ी और ख्वाजा साहब से अपनी मुरादें मांगीं। झंडा रस्म में जायरीनों की भारी भीड़ उमड़ी। लंगरखाने से असर की नमाज के बाद शुरू हुए इस आयोजन में हर तरफ ‘या गरीब नवाज’ और ‘ख्वाजा पीयां के दर पर’ जैसे नारे गूंजते रहे। पुलिस प्रशासन ने इस रस्म को देखते हुए पुख्ता सुरक्षा इंतजाम किए थे। दरगाह क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। सीसीटीवी कैमरों की निगरानी, ड्रोन से सर्विलांस और बैरिकेडिंग के जरिए भीड़ को नियंत्रित रखा गया। 82 वर्षों से अदा कर रहा गौरी परिवार यह रस्म भीलवाड़ा का गौरी परिवार 82 वर्षों से यह रस्म निभा रहा है। झंडा चढ़ाने की परंपरा 1928 में पेशावर के हजरत सैयद अब्दुल सत्तार बादशाह जान रहमतुल्लाह अलैह ने शुरू की थी। इसके बाद 1944 से भीलवाड़ा के लाल मोहम्मद गौरी का परिवार यह रस्म अदा कर रहा है। गौरी परिवार के लाल मोहम्मद गौरी ने 1944 से 1991 तक और उनके बाद मोइनुद्दीन गौरी ने 2006 तक यह रस्म निभाई। इसके बाद फखरुद्दीन गौरी ये रस्म अदा कर रहे हैं। उर्स की विधिवत शुरूआत 22 से उर्स कन्वीनर हाजी सैय्यद हसन हाशमी ने बताया-हर साल जमादिल आखिर महीने की 25 तारीख को गरीब नवाज के सालाना उर्स का झंडा बुलंद दरवाजे पर चढ़ाया जाता है। गरीब नवाज की दरगाह के बुलंद दरवाजे पर सालाना उर्स का झंडा चढ़ने के साथ ही उर्स की अनौपचारिक शुरुआत मानी जाती है। चांद दिखाई देने पर 21 या फिर 22 को उर्स की विधिवत शुरूआत होगी। इसमें 26 को जुमा, 27 दिसंबर को छठी व 30 दिसंबर को बडे़ कुल की रस्म होगी। 20 को उतारेंगे संदल महान सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की मजार पर साल भर चढ़ाया जाने वाला संदल 20 दिसंबर को उतारा जाएगा। खुद्दाम-ए-ख्वाजा यह रस्म अदा करेंगे। जन्नती दरवाजा 21 को खोला जाएगा। 21 से 28 दिसंबर तक उर्स के दौरान सुबह 4 बजे आस्ताना शरीफ खुलेगा। प्रतिदिन मजार शरीफ की खिदमत होगी। साल में चार बार खुलता है जन्नती दरवाजा सालभर में जन्नती दरवाजा चार बार खोला जाता है लेकिन उर्स में सबसे ज्यादा 6 दिन के लिए खुलता है। इसके बाद एक दिन ईद उल फितर के मौके पर, एक दिन बकरा ईद के मौके पर और एक दिन ख्वाजा साहब के गुरु हजरत उस्मान हारूनी के सालाना उर्स के मौके पर यह दरवाजा खुलता है। परंपरा के अनुसार जन्नती दरवाजा उर्स में आने वाले जायरीन के लिए खोला जाता है। इसी परंपरा के अनुसार यह दरवाजा कुल की रस्म के बाद 6 रजब को बंद कर दिया जाता है। साल भर बांधते हैं मन्नत का धागा जन्नती दरवाजे पर साल भर जायरीन मन्नत का धागा बांधते हैं। जन्नती दरवाजा खुलने के बाद से ही जायरीन की आवक बढ़ जाती है। दरगाह जियारत को आने वाले जायरीन जन्नती दरवाजा से जियारत करने के लिए बेकरार नजर आते हैं। जायरीन सिर पर मखमल की चादर और फूलों की टोकरी लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं। (फोटो-वीडियो सहयोग-मोहम्मद नजीर कादरी)

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