भास्कर न्यूज | गढ़वा अनुमंडल दंडाधिकारी गढ़वा सदर के न्यायालय में बीते कैलेंडर वर्ष में 582 वादों का निस्तारण हुआ। इनमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126, 163, 164, 166 से जुड़े मामलों के अलावा विविधवाद, पब्लिक न्यूसेंस, अतिक्रमण, बेदखली वाद व नीलाम पत्र वाद आदि शामिल हैं। उक्त मामलों के अलावा उन्होंने आपसी रक्त संबंधियों के कुछ मामलों में उन्होंने मध्यस्थता कर समझौता करवाए तथा लोक अदालत से उन्हें निस्तारित करवाया। अनुमंडल दंडाधिकारी संजय कुमार ने नागरिकों से अपील की है कि वे छोटे-मोटे भूमि विवाद, विशेषकर पारिवारिक और आपसी मतभेद को यथासंभव आपसी संवाद, समझौते और सहमति के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करें। वहीं ऐसे मामलों को एसडीएम न्यायालय तक न लाएं। एसडीएम ने कहा कि जब कोई व्यक्ति न्यायालय में अपना वाद अथवा प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करता है। तो वह मामला वर्षों तक चलता रहता है। इस दौरान सगे भाई-बहन, पिता-पुत्र, माता-पुत्र, दादा-दादी, नाना-नानी सहित पूरे परिवार के रिश्तों में कड़वाहट आ जाती है। आपसी बोलचाल तक बंद हो जाती है और प्रेम, विश्वास तथा अपनापन धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। उन्होंने कहा कि समाज में संयुक्त परिवार वैसे भी संकटमय स्थिति से गुजर रहे हैं। ऊपर से भूमि विवाद उनके अस्तित्व पर और भी बड़ा संकट पैदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि न्यायालयीन प्रक्रिया में दोनों पक्षों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं बहुमूल्य समय भी नष्ट होता है। इतना ही नहीं, निर्णय आने के बाद भी अक्सर अपील की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। जिससे विवाद समाप्त होने के बजाय लगातार चलता ही रहता है। एसडीएम ने कहा कि जब भी सगे रक्त संबंधियों के बीच एक ही भूमि विवाद को लेकर बार-बार मामले न्यायालय में आते हैं।तो उनका पहला प्रयास दोनों पक्षों को समझाकर आपसी सहमति से समाधान कराने का रहता है। कई बार तो वे स्वयं ऐसे मामलों में संबंधित लोगों के घर तक पहुंचकर सभी पक्षों को समझाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि अब तक बड़ी संख्या में ऐसे पारिवारिक भूमि विवादों का समाधान कराया जा चुका है। जो अनावश्यक रूप से न्यायालय के चक्कर काट रहे थे। आपसी संवाद और समझदारी के माध्यम से न केवल मामलों का निपटारा हुआ। बल्कि वर्षों से बिगड़े पारिवारिक संबंध भी दोबारा जुड़े हैं। एसडीएम ने भावुक अपील करते हुए कहा कि जमीन से कहीं अधिक कीमती रिश्ते होते हैं। थोड़ी-सी समझदारी, संवाद और त्याग से घर के भीतर ही विवाद सुलझाए जा सकते हैं। इससे न केवल धन और समय की बचत होती है, बल्कि परिवार की खुशियां और सामाजिक सौहार्द भी बना रहता है। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि छोटे एवं पारिवारिक भूमि विवादों के समाधान हेतु पंचायत, मध्यस्थता एवं आपसी सहमति का मार्ग अपनाएं और अनावश्यक रूप से न्यायालयीन प्रक्रिया में न उलझें।


