मेवाड़ के पूर्व राज परिवार के सदस्य डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ को गद्दी पर विराजित कराने की परंपरा बुधवार को पूरी हुई। सफेद रंग के विशेष वस्त्र-आभूषण पहनकर डॉ. लक्ष्यराज सिंह अपने बेटे हरितराज सिंह के साथ पहले शंभू निवास पैलेस से लवाजमे के साथ सिटी पैलेस स्थित नौ चौकी महल के राय आंगन में पहुंचे। यहां लक्ष्यराज सिंह ने पूर्व निर्धारित समयानुसार सुबह 9:30 बजे हवन-पूजन के साथ गद्दी उत्सव की परंपरा की विधिवत शुरुआत की। ब्राह्मणों के वेद मंत्र गूंजे। इस दौरान बड़ी संख्या में मेवाड़ के संत-महंत, क्षत्रिय सहित अन्य समाजों के प्रतिनिधि सफेद रंग के विशेष वस्त्र धारण कर पहुंचे। विधिवत पूजन के बाद पूर्व राजघराने के कुल गुरु डॉ. वागीश कुमार गोस्वामी ने डॉ. लक्ष्यराज सिंह को तिलक लगाया और गद्दी पर आसीन किया। डॉ. लक्ष्यराजसिंह के गद्दी पर आसीन होते ही सरदारों व अन्य लोगों ने नजराने की रस्म अदा की। डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने संंत-महंतों का आशीर्वाद लिया। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करवाने की रस्म पूरी की गई। इसके बाद डॉ. लक्ष्यराज सिंह ने सरदारों व अन्य गणमान्यों संग जनाना महल प्रांगण में भोजन किया। गद्दी की रस्म के बाद देर रात तक अलग-अलग परंपराएं निभाई गईं। गद्दी उत्सव में उपस्थित लोगों के लिए ड्रेस कोड निर्धारित किया गया था। पुरुषों के लिए सफेद कुर्ता-पायजामा और महिलाओं के लिए सफेद सूट या पारंपरिक सफेद पोशाक तय की गई थी। समारोह के दौरान लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ भी सफेद परिधान में नजर आए। ओडिशा के डिप्टी सीएम, कवि शैलेष, गायक कलाकार छोटू सिंह भी पहुंचे गद्दी उत्सव व रंग पलटाई दस्तूर के दौरान डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के ससुर व ओडिशा के डिप्टी सीएम कनक वर्धन सिंह देव, कवि व अभिनेता शैलेष लोढ़ा, क्षत्रिय करणी सेना के संस्थापक अध्यक्ष राज शेखावत, शक्ति सिंह बांदीकुई, संगीतज्ञ छोटू सिंह रावणा, ईवेंट प्लानर जयदीप उर्फ जेडी भाई मेहता सहित अन्य समाजों के प्रतिष्ठित पदाधिकारी मौजूद रहे। डिप्टी सीएम कनक वर्धन सिंह ने कहा कि मेवाड़ का पूर्व राजपरिवार 1500 साल पुरानी परंपराओं का वर्तमान में भी उसी तरह निर्वहन करता है तो गर्व की अनुभूति होती है। शांति और गरिमापूर्ण रहा कार्यक्रम बता दें कि डॉ. लक्ष्यराज सिंह के पिता 81 वर्षीय अरविंद सिंह मेवाड़ का 16 मार्च को निधन हो गया था। इसके बाद से पूर्व राजपरिवार में शोक की रस्में चल रही थी। बुधवार को इन सभी दस्तूरों के साथ शोक संपन्न हो गया। कार्यक्रम शांति और गरिमापूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। इससे पहले अरविंद सिंह मेवाड़ के बड़े भाई महेंद्र सिंह का पिछले साल 10 नवंबर को निधन हुआ था। तब पूर्व राज परिवार के दोनों पक्षों में विवाद सामने आया था। अश्व पूजन : दोपहर 3 बजे आयोजन, विशेष त्योहारों पर भी करते हैं पूजन गद्दी पर आसीन करने की रस्म के बाद सिटी पैलेस के शंभू निवास में निर्धारित समय दोपहर 3 बजे डॉ. लक्ष्यराज सिंह ने अश्व पूजन किया। उनके बेटे हरितराज सिंह भी मौजूद रहे। पंडितों ने मंत्रोच्चार के साथ पूजन कराया। इसके पीछे मान्यता यह है कि अश्व स्वामी भक्ति का प्रतीक है। इसका बड़ा उदाहरण महाराणा प्रताप का अश्व चेतक था, जिसने हल्दी घाटी युद्ध में घायल होकर भी उन्हें युद्ध भूमि से सुरक्षित बाहर निकाला था। इसलिए मेवाड़ का पूर्व राजपरिवार विशेषकर राजतिलक या गद्दी विराजने के अलावा विशेष त्योहारों पर भी अश्व पूजन करता है। डॉ. लक्ष्यराज सिंह ने महाराणा प्रताप के अश्व चेतक को भी याद किया। हाथीपोल पूजन : लोगों ने किया मेवाड़ का स्वागत शाम 7 बजे डॉ. लक्ष्यराज सिंह लवाजमे के साथ हाथीपोल द्वार पहुंचे, जहां विधि-विधान के अनुसार हाथीपोल द्वार का पूजन किया। यहां डॉ. लक्ष्यराज का शहरवासियों-कारोबारियों ने स्वागत किया। इसके बाद वे सीधे पैलेस पहुंचे। रंग पलटाई : सरदार और पदाधिकारियों की मौजूदगी हाथीपोल द्वार पूजन के बाद डॉ. लक्ष्यराज सिंह की रंग पलटाई और भाईपा की रस्म का आयोजन रात 8:15 बजे सिटी पैलेस के दरबार हॉल में हुआ। इसमें सरदारों और गणमान्य पदाधिकारियों के अलावा अन्य लोगों की मौजूदगी रही। जगदीश मंदिर : सभी परंपराएं पूरी कर दर्शन को पहुंचे सभी परंपराओं को पूरी करने के बाद लक्ष्यराज सिंह रात 9 बजे जगदीश मंदिर पहुंचे। यहां जगन्नाथरायजी की विशेष पूजा-अर्चना की। मंदिर के पुजारियों ने परंपरानुसार स्वागत कर शुभाशीष प्रदान किया। इस दौरान काफी संख्या में लोग मौजूद रहे। श्रीएकलिंगनाथजी मंदिर : पगड़ी का रंग बदला, शोक भंग शाम 5 बजे लक्ष्यराज सिंह कैलाशपुरी स्थित एकलिंगनाथजी मंदिर पहुंचे। विधिवत पूजा-अर्चना कराकर पूर्वजों की प्राचीन परंपराओं का निर्वहन किया। मंदिर में ही उनके शोक भंग की रस्म निभाई गई। इस दौरान विधि-विधान के साथ पगड़ी का रंग बदला गया। मंदिर में दर्शन से पहले डॉ. सिंह ने तालाब पूजन किया। इस दौरान जगह-जगह पुष्पवर्षा की गई। कैलाशपुरी की महिलाओं ने स्वागत में धार्मिक गीत गाए और मालाएं पहनाईं। इससे पहले हरियाली पूजन की परंपरा का भी निर्वहन किया गया।


