गांव से गोविंदपुर – साहिबगंज हाइवे पर जाने के लिए ग्रामीणों को 200 मीटर की जगह 7 किलोमीटर दूर घूमकर जाना पड़ता है

भास्कर न्यूज | पबिया नारायणपुर प्रखंड के मदनाडीह पंचायत स्थित जादूडीह गांव आज भी सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। गांव के लोग बरसों से पुल की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई। बरसात में नदी का जलस्तर बढ़ते ही गांव का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। लोग जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं। जादूडीह से धरमपुर की दूरी सिर्फ 200 मीटर है, लेकिन पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को 7 किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है गोविंदपर साहिबगंज हाइवे पर। पुल नहीं रहने के कारण जादूडीह, रघुनाथपुर, धरमपुर, तेतिलियाटांड़ गांव के लगभग पांच हजार की आवादी प्रभािवत है। इन ग्रामीणों का न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि जान का खतरा भी है। इन गांव के रास्ते अब भी कच्चे हैं। बारिश में कीचड़ से भर जाते हैं। निकलना मुश्किल हो जाता है।ग्रामीणों ने बताया कि यदि नदी पर छोटा पुल बन जाए, तो हाइवे से सीधा संपर्क हो जाएगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की राह आसान हो जाएगी। गांव में सिर्फ आठवीं तक की पढ़ाई होती है। इसके बाद बच्चों को जामताड़ा जाना पड़ता है। नदी पार कर बस और ऑटो पकड़ के सहारे से स्कूल जाना पड़ता है। बरसात में यह रास्ता जानलेवा बन जाता है। अभिभावक डरते हैं, लेकिन मजबूरी में बच्चों को भेजना पड़ता है। बरसात में इन गांवों का टूट जाता है संपर्क चुनाव के समय भी ग्रामीणों को वोट डालने के लिए 7 किलोमीटर घूमना पड़ता है। पुल बन जाए तो यह दूरी सिर्फ 200 मीटर रह जाएगी। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ दूरी नहीं, विकास और उपेक्षा के बीच की खाई है। गांव के शिक्षक इफ्तेकार आलम, अख्तर अंसारी, रफिक अंसारी, सुरेंद्र मुर्मू, मुलिंदर मुर्मू, हैदर अंसारी, मुखिया टुडू, मंटू हेंब्रम, हाफिज अंसारी, मनसा टुडू समेत अन्य लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द पुल बनाया जाए। चेतावनी दी है कि मांग नहीं मानी गई तो आंदोलन करेंगे।ग्रामीणों ने अपील की है कि जिला प्रशासन, मंत्री और जनप्रतिनिधि गांव आकर हालात देखें। उनका कहना है कि पुल बनाना मुश्किल नहीं है, बस राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। बरसात करीब है, नदी में जलभराव से गांव का संपर्क टूटने का डर है। लोग पहले से तैयारी कर रहे हैं कि नदी कैसे पार करें। हर साल कई आर पार के दौरान घायल हो जाते हैं। ग्रामीणों की पीड़ा अब आक्रोश में बदल रही है। वे अब चुप नहीं बैठना चाहते।

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