गायत्री यज्ञ में दादा-दादी संग बच्चों ने दी आहुतियां:स्कूल में मनाया बसंत पंचमी पर्व, डायरेक्टर बोली- ऐसे आयोजन बच्चों को पारिवारिक मूल्यों से जोड़ते

जोधपुर की शांति निकेतन ग्लोबल स्कूल में बसंत पंचमी का पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला बन गया। गायत्री यज्ञ में जब नन्हे हाथों ने अपने बुजुर्गों (ग्रैंड पेरेंट्स) के साथ मिलकर अग्नि में आहुतियां दीं, तो माहौल वैदिक मंत्रोच्चार और आत्मीयता से महक उठा। मौका था बसंत पंचमी के पावन अवसर पर आयोजित विशेष सांस्कृतिक व आध्यात्मिक कार्यक्रम का। कार्यक्रम की खासियत रही कि इसमें विद्यार्थियों के साथ विशेष रूप से उनके दादा-दादी और नाना-नानी को आमंत्रित किया गया था। ज्ञान और ऊर्जा के रंग में रंगे विद्यार्थी
स्कूल के सभी बच्चे और उनके ग्रैंड पेरेंट्स पीले रंग के वस्त्रों में सुसज्जित होकर पहुंचे। शिक्षकों ने बच्चों को सरल शब्दों में समझाया कि पीला रंग केवल एक रंग नहीं, बल्कि ज्ञान, ऊर्जा, सकारात्मकता और बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। बच्चों ने इस रंग के पीछे छिपे सांस्कृतिक भाव और परंपरा को गहराई से जाना। मुख्य आकर्षण स्कूल में आयोजित गायत्री यज्ञ रहा। बच्चों ने अपने ग्रैंड पेरेंट्स के सान्निध्य में मंत्रोच्चार के बीच आहुतियां दीं। इस सामूहिक सहभागिता का उद्देश्य बच्चों को केवल पूजा-पाठ तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उन्हें बड़ों के साथ जोड़कर संस्कार, सदाचार और अनुशासन का व्यावहारिक ज्ञान देना था। खेल-खेल में मजबूत हुई रिश्तों की डोर
यज्ञ के बाद माहौल और भी खुशनुमा हो गया जब बच्चों और बुजुर्गों के लिए विभिन्न खेल और सहभागितात्मक गतिविधियां आयोजित की गईं। इन गतिविधियों ने दो पीढ़ियों के बीच के फासले को कम करते हुए प्रेम और सहयोग की भावना को मजबूत किया। बच्चों ने खेल-खेल में बड़ों का सम्मान करना और मिल-जुलकर कार्य करने का हुनर सीखा। डायरेक्टर ने कहा- जड़ों से जुड़ना जरूरी
कार्यक्रम के समापन पर स्कूल की डायरेक्टर डॉ. शोभा मोदी ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन बच्चों को अपनी संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ते हैं। जब बच्चे अपने ग्रैंड पेरेंट्स के साथ ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, तो उनमें संस्कार, अनुशासन और सम्मान की भावना स्वतः विकसित होती है। हमारा उद्देश्य शिक्षा के साथ-साथ बच्चों का नैतिक और सांस्कृतिक विकास करना है।

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