गुरदासपुर में चाइना डोर का बढ़ा खतरा:15 साल पहले देश में बनाई थी जगह, पारंपरिक डोर बनाने वाले कारीगरों पर संकट

गुरदासपुर जिले में लोहड़ी के त्योहार से पहले पतंगबाजी में चाइना की ड्रैगन डोर का खतरा फिर बढ़ गया है। बता दे कि पिछले 15 सालों से पारंपरिक धागे की डोर की जगह चाइना डोर का इस्तेमाल हो रहा है। इसके कारण लाखों हादसे हो चुके हैं और कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। ड्रैगन डोर के कारण न केवल इंसानों को बल्कि लाखों पशु-पक्षियों को भी नुकसान पहुंचा है। इन घटनाओं के बावजूद, लोग पतंगबाजी के लिए चाइना डोर का ही उपयोग करते हैं।दूसरी ओर, पारंपरिक धागे की डोर बनाने वाले कारीगर अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चाइना डोर पर कार्रवाई की मांग पारंपरिक धागे की डोर बनाने वाले कारीगर सरकार से सख्त कार्रवाई की उम्मीद लगाए बैठे हैं ताकि चाइना डोर पर पूरी तरह प्रतिबंध लग सके।कारीगरों का कहना है कि यदि पारंपरिक डोर का उपयोग अनिवार्य हो जाए, तो लोगों की जान तो बचेगी ही, साथ ही लाखों कारीगर परिवारों को भी रोजगार मिल सकेगा। ड्रैगन डोर ने 15 साल पहले बनाई थी जगह बता दे कि चीन की ड्रैगन डोर ने लगभग 15 साल पहले भारत में अपनी जगह बनाई थी। यह डोर इस कदर लोकप्रिय हो चुकी है कि लोग अब दूसरी डोर की तरफ देखते भी नहीं हैं। हर साल सामाजिक संस्थाओं और सरकार द्वारा इसके प्रयोग न करने की सलाह दी जाती है, लेकिन इस पर सख्ती से काम नहीं किया जाता। सख्ती के बावजूद बिक रहा ड्रैगन डोर कारीगरों का यह भी कहना है कि जैसे-जैसे सरकार इस डोर पर सख्ती करती है, यह और महंगी होकर लोगों तक पहुंच जाती है। पारंपरिक धागे की डोर बनाने वाले कारीगरों ने मांग की है कि इस पर जल्द से जल्द अंकुश लगाया जाए, ताकि लोगों की जान बचाई जा सके और पारंपरिक डोर को बढ़ावा मिले। इससे कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन कर सकेंगे और उनके परिवारों का भरण-पोषण हो सकेगा।

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