रायपुर के आम्रपाली सोसाइटी के रहने वाले आशीष सुराना (44) उनकी पत्नी रितु सुराना (42) और उनके दो बेटे आर्यन (16) और आरुष (14) 8 फरवरी को मुंबई में दीक्षा लेंगे। सांसारिक वैभव, नाते-रिश्तेदार का त्याग कर वे तप, साधना और स्वाध्याय को अपनाएंगे। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में परिवार ने बताया कि ये निर्णय एक दिन या एक महीने का नहीं बल्कि 3 साल लगे खुद को और पूरे परिवार को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करने में…जानते हैं कैसे उन्होंने दीक्षा लेने का निर्णय लिया आशीष ने बताया, ‘हमारे घर में पहले ही धार्मिक माहौल था, ये जैन कुल में जन्म का भी असर है। मंदिर, दर्शन, तप, त्याग… सब थोड़ा-बहुत चलता था। लेकिन दीक्षा तक पहुंचने की शुरुआत 3 साल पहले हुई। श्वेत तिलक मुनि और कंचन तिलक मुनि का चातुर्मास राजधानी के भैरव सोसायटी में हुआ। उनके दर्शन करने पहुंचा और प्रवचन सुना तब पहली बार मन में हलचल हुई कि धर्म को थोड़ा गहराई से समझना चाहिए। पूरी मेहनत करने के बाद भी, शांति क्यों नहीं मिल रही? यहीं से बदलाव शुरू हुआ। तब मन में गुरुकुलवास जाने की इच्छा बढ़ने लगी। वहां गया और आचार्य योग तिलक मुनि के प्रवचन में समझ आया कि पाने में नहीं… छोड़ने में भी सुख है। यह बात भीतर उतर गई। धीरे-धीरे मैं जुड़ता गया। शुरू के दिनों में घर की दिनचर्या ऐसी थी कि पूरी तरह समय नहीं दे पाता था। मेरा बैग का होलसेल बिजनेस है- बॉम्बे से सामान बनवाना, लाना, टूर, दुकान… लेकिन जैसे-जैसे मन धर्म में बढ़ता गया, व्यापार पीछे छूटता गया। पिछले तीन साल में मेरा टूर लगभग थम ही गया। अब सुबह प्रतिक्रमण, दर्शन, फिर स्वाध्याय, रात को डेढ़ घंटे उपाश्रय। गुरुकुल के जीवन ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। वहां हर साधु दूसरों को सुख देने में सुख मानते हैं। किसी के चेहरे पर तनाव नहीं, थकान नहीं, किसी प्रकार की शिकायत नहीं।’ यह देखकर लगा कि यही जीवन हमें चाहिए। हालांकि इस समय तक भी दीक्षा की बात मन में नहीं आई थी। पहले यह समझना था कि कमी कहां है। प्रवचन, स्वाध्याय और गुरु भगवंत के पास समय बिताने से यह स्पष्ट हुआ कि सुख बाहर नहीं, भीतर है। धीरे-धीरे यही भीतर का आकर्षण दीक्षा का संकल्प बन गया। मां दुखी हुईं, पर बोलीं-यही सही रास्ता
आशीष के मुताबिक सबसे बड़ी चुनौती घरवालों को तैयार करना था। परिवार में मां, बड़े भैया, भाभी और उनके दो बच्चे हैं। हम भाइयों और परिवारों का जुड़ाव ऐसा है कि उनसे या मुझसे कोई भी पूछता तो हम चार बच्चे बताते हैं। मां भी दुखी हुईं, लेकिन इस निर्णय में उन्होंने सहयोग किया। उन्होंने भी कहा कि दुख तो जरूर है पर तुमने सही रास्ता चुना है। मैंने सबको बताया कि हमें सिर्फ ‘सुख’ नहीं, ‘सच्चा सुख’ चाहिए।


