विशेष संवाददाता|रांची खालसा पंथ के प्रणेता गुरु गुरुनानक देव ने अपने देवलोक गमन से पहले गुरु अंगद देव को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उन्हें गुरु अंगद देव नाम दिया। गुरु अंगद देव ने न केवल शबद कीर्तन की शुरुआत की, बल्कि गुरमुखी को विकसित किया, जो सिख धर्म के लिए अहम है। उन्होंने गुरुनानक देव द्वारा शुरू की गई लंगर की परंपरा को भी मजबूत किया, जो सिख धर्म की खासियत है। यह उद्गार सोमवार को श्री गुरु सिंह सभा रांची द्वारा आयोजित सिखों के दूसरे गुरु गुरु अंगद देव के प्रकाशोत्सव पर गुरुद्वारा के हेड ग्रंथी ज्ञानी विक्रम सिंह ने व्यक्त किए। मेन रोड गुरुद्वारा में आयोजित गुरु अंगद देव के प्रकाशोत्सव में उन्होंने बताया कि गुरु अंगद देव शारीरिक स्वास्थ्य पर जोर देते थे और लोगों को स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करते थे। गुरमुखी को विकसित करने के लिए उन्होंने कई स्कूलों की स्थापना की और इस भाषा को बढ़ावा दिया। विशेष दीवान की शुरुआत हजूरी रागी भाई भरपूर सिंह और उनके साथियों ने आसा दी वार कीर्तन के साथ की। शबद कीर्तन करते हुए उन्होंने बताया कि गुरु अंगद देव ने सिख धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया और शबद कीर्तन की परंपरा को आगे बढ़ाया। अरदास और हुकमनामे के साथ दीवान की समाप्ति हुई। दीवान की समाप्ति पर गुरु के अटूट लंगर का आयोजन किया गया। इस अवसर पर श्री गुरु सिंह सभा के महासचिव गगनदीप सिंह सेठी ने बताया कि श्री गुरु सिंह सभा की महासभा गुरुद्वारा में 17 अगस्त को 11.30 बजे होगी और उसमें चुनाव के बारे में विचार-विमर्श किया जाएगा। आयोजन में प्रधान सरदार गुरमीत सिंह, सरदार ज्ञान सिंह, हरप्रीत सिंह रिंकू रामप्रीत सिंह, सुरजीत सिंह, कुलवंत सिंह, जसवीर सिंह बंटी और स्त्री सत्संग सभा की सदस्यों ने हाजिरी भरी।


