गौरैया संस्थान में लोकगीतों की कार्यशाला:भारतीय लोकसंस्कृति को सहेजने के लिए सिखाए जा रहे बसंत, गंगा गीत

गौरैया संस्कृति संस्थान ने भारतीय लोकसंस्कृति को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से एक कार्यशाला का आयोजन किया है। इस कार्यशाला में बसंत गीत, गंगा गीत, मेला गीत और खिचड़ी स्पेशल गीतों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। यह आयोजन गोमतीनगर के वास्तुखण्ड में हो रहा है। संस्था की संस्थापक और लोकगायिका रंजना मिश्रा ने बताया कि कार्यशाला में पारंपरिक लोकगीतों को सरल विधि से सिखाया जा रहा है, ताकि प्रतिभागी उनकी भावनाओं और परंपराओं को गहराई से समझ सकें। कार्यशाला की शुरुआत देवी गीत ‘लिखि लिखि चिठिया…’ से हुई थी। खिचड़ी पर्व से जुड़ा मेला गीत सिखाया गया चौथे दिन प्रतिभागियों को खिचड़ी पर्व से जुड़ा मेला गीत ‘लागल बा खिचड़ी के मेला, बलम तनी मेला घुमाय दा…’ सिखाया गया। इसके अतिरिक्त, गंगा किनारे लगने वाले मेलों पर आधारित गीत ‘गंगा किनारे लगा मेला, चलो सखि…’ और विवाह संस्कार से जुड़े गीत ‘कहवा से आये राजा जनक जी…’ तथा ‘सखी छोटी ननद बेंदे पे अंजी…’ भी सिखाए गए। 11 लोकगीत सिखाए जाएंगे रंजना मिश्रा ने जानकारी दी कि कुल लगभग 11 लोकगीत सिखाए जाएंगे, जो विभिन्न पर्वों, उत्सवों और सामाजिक अवसरों पर आधारित होंगे। संस्था की उपाध्यक्ष आभा शुक्ला ने बताया कि कार्यशाला में महिलाओं की भागीदारी उत्साहजनक रही।प्रतिभागियों में प्रतिमा त्रिपाठी, अल्पना श्रीवास्तव, रमा सिंह, सुनीता निगम, नीलम तिवारी, लता तिवारी, सरिता अग्रवाल, सुषमा, रीना सिंह, नवनीता जफा और गोपाली चंद्रा सहित कई महिलाएं शामिल थीं। सभी में लोकसंस्कृति सीखने के प्रति विशेष उत्साह देखा गया।

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