गौशालाओं से प्रदूषण पर हाईकोर्ट सख्त, CPCB अफसर तलब:हाईकोर्ट ने केंद्र से पूछा- क्या गौशालाएं फैला रही हैं प्रदूषण? 10 दिसंबर को जवाब दें जिम्मेदार

राजस्थान हाईकोर्ट ने गौशालाओं से होने वाले कथित प्रदूषण को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को निर्देश दिया है कि वह कोर्ट को बताए कि गौशालाओं की वर्तमान स्थिति क्या है और वे किस प्रकार का प्रदूषण फैला रही हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने ‘राजस्थान गो-ग्राम सेवा संघ’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए निर्देश दिया है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) का एक जिम्मेदार अधिकारी अगली सुनवाई पर कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बोर्ड को गौशालाओं की स्थिति और उनसे उत्पन्न होने वाले प्रदूषण की प्रकृति के बारे में पूरी जानकारी पटल पर रखनी होगी। अगली सुनवाई 10 दिसंबर को हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2025 को तय की है। उस दिन CPCB के अधिकारी को यह बताना होगा कि क्या वास्तव में गौशालाएं प्रदूषण का स्रोत बन रही हैं और यदि हां, तो उसका स्वरूप क्या है। सवाल प्रदूषण नियमों के दायरे में रखने का अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि क्या गौशालाओं को भी कमर्शियल डेयरियों की तरह प्रदूषण नियमों के दायरे में रखा जाना चाहिए। CPCB के नियमों के अनुसार, बड़ी गौशालाओं और डेयरियों से निकलने वाले गोबर और अपशिष्ट (Waste) को अगर सही तरीके से निस्तारित नहीं किया जाए, तो यह जल और वायु प्रदूषण का कारण बन सकता है। कोर्ट अब इसी तकनीकी पहलू पर CPCB से स्पष्टीकरण चाहता है। गौशालाओं से किस तरह का प्रदूषण CPCB की गाइडलाइन्स के अनुसार, डेयरी फार्म और गौशालाओं से होने वाले प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दे गोबर और मूत्र के अपशिष्ट जल के निपटान से संबंधित हैं। एक बोवाइन पशु (गाय/भैंस), जो औसतन 400 किलोग्राम वजन का होता है, प्रतिदिन 15-20 किलोग्राम गोबर और 12-14 लीटर मूत्र का उत्सर्जन करता है। गोबर और अपशिष्ट जल के खराब प्रबंधन से जल प्रदूषण और दुर्गंध की समस्या उत्पन्न होती है।​ कई डेयरी फार्म और गौशालाएं पशुओं के गोबर को अपशिष्ट जल के साथ नालियों में बहा देते हैं, जिससे नालियां बंद हो जाती हैं और अंततः यह नदियों में पहुंचकर जल प्रदूषण पैदा करता है। इन बंद नालियों में मच्छरों के प्रजनन से स्वास्थ्य खतरे और दुर्गंध की समस्या उत्पन्न होती है। गोबर से कार्बन डाइऑक्साइड, अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन जैसी कई गैसें निकलती हैं जो वातावरण में उत्सर्जित होकर दुर्गंध का कारण बनती हैं।​ CPCB की गाइडलाइन्स CPCB ने जुलाई 2021 में “डेयरी फार्म और गौशालाओं के पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश” (संशोधित) जारी किए थे। इन दिशानिर्देशों के अनुसार, संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB)/प्रदूषण नियंत्रण समितियां/स्थानीय निकाय/नगर निगम को डेयरी फार्म और गौशालाओं की नियमित निगरानी करनी चाहिए ताकि गोबर और अपशिष्ट जल के उचित निपटान को सुनिश्चित किया जा सके और पर्यावरणीय मानदंडों का अनुपालन सुनिश्चित हो।​ CPCB ने 10 जुलाई 2020 को जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 की धारा 18(1)(b) के तहत निर्देश जारी किए थे कि डेयरी फार्मों को ऑरेंज श्रेणी और गौशालाओं को ग्रीन श्रेणी में वर्गीकृत किया जाए।​ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारी गाइडलाइन्स के अनुसार, SPCB/PCC प्रत्येक जिले से यादृच्छिक रूप से चयनित कम से कम 2 डेयरी फार्मों और 2 गौशालाओं का पर्यावरणीय ऑडिट करेंगे और अनुपालन तथा की गई कार्रवाई की रिपोर्ट छमाही आधार पर CPCB को प्रस्तुत करेंगे। SPCB/PCC अपने अधिकार क्षेत्र में स्थित डेयरी फार्मों और गौशालाओं द्वारा दिशानिर्देशों के अनुपालन की स्थिति रिपोर्ट के रूप में हर छह महीने में एक बार CPCB को प्रस्तुत करेंगे।​ पर्यावरणीय मानदंडों का उल्लंघन पर कार्रवाई गाइडलाइन्स के अनुसार, यदि कोई डेयरी फार्म या गौशाला पर्यावरणीय मानदंडों का उल्लंघन करती पाई जाती है तो उसके खिलाफ जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम और वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।​ गौशालाओं में समाधान की संभावनाएं NITI Aayog की रिपोर्ट के अनुसार, गौशालाओं में गोबर और मूत्र से वर्मीकम्पोस्ट, बायोगैस, जैव उर्वरक, बायो-CNG और पंचगव्य जैसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं। कुछ आदर्श गौशालाएं अपनी क्षमता के आधार पर सीमित पशुओं को रखती हैं और अपशिष्ट के पुनर्चक्रण में संलग्न हैं। ये गौशालाएं अन्य गौशालाओं के लिए संसाधन, सूचना और क्षमता निर्माण केंद्र बन गई हैं तथा किसानों को वर्मीकम्पोस्टिंग, बायोगैस और जैव उर्वरक पर प्रशिक्षण देती हैं।​

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