ग्रेमी अवॉर्ड विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट ने कहा:सोलो-संगत में जाकिर साहब कभी सा​थियों पर हावी नहीं हुए, ज​बकि वो तबले के शेर ​थे

जाकिर साहब का यूं चले जाना मेरे लिए बहुत निजी क्षति है। वे जयपुर में कई बार श्रुति मंडल के आमंत्रण पर प्रस्तु​​ति देने आए। यहां लोग उनकी तबले पर जादूगरी को सराहते थे। 5 जनवरी 2019 काे भी श्रुति मंडल की ओर से बिड़ला ऑडिटाेरियम में आयाेजित कार्यक्रम में अंगुलियाें और तबले का गजब का तालमेल दिखाया। उन्हाेंने एक साथ तीन तबले बजाए। इनमें एक बाएं और दाे दाएं रखे और तीनाें पर लय ताल की अनूठा संगम देखने काे मिला। इस दाैरान हर चीज कायदे से सजी थी चाहे वाे राधा की नाराजगी थी, शिव की सभा, जंगलों में उछल-कूद करते हिरण और पटरी पर दाैड़ती ट्रेन। उनके साथ सारंगी पर उस्ताद साबिर खान ने राग वाचस्पति के स्वराें की पूरी साधना की। उन्हाेंने शिव की आराधना में घंटे, घड़ियाल और डमरू के स्वर सुनाए। यह कहना है ग्रेमी अवॉर्ड विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट का। बात 1984 की है जब वे रामबाग में ठहरे थे। मैं स्कूटर चलाकर उनसे मिलने गया। उन्होंने बड़े आत्मीय भाव से पूछा- कहां रहते हो? जैसे बताया बहुत पास, तो वे स्कूटर पर बैठकर मेरे साथ घर आए और बहुत सी कला जगत की बातें कीं। विश्व माेहन ने बताया कि एक बार चेन्नई में उनके सा​थ प्रस्तुति थी। मेरी, जाकिर साहब और मशहूर घटक वादक पद्मभूषण विक्कू विनायक राम ​की जुगलबंदी थी। इस मौके पर मैं मुख्य कलाकार की भूमिका में था पर वो कभी संगतकार होने के नाते दूसरे कलाकार पर हावी नहीं होते थे, जबकि वो अपनी कला के जादूगर कहिए या यूं कहें एक तरह के शेर थे। उनमें विनम्रता बहुत ज्यादा थी। जाकिर खान से मुलाकात के बाद मुझे तबले की वो बारीक सीखने को मिली जिससे पूरा जीवन ही बदल गया। आज मैं 50 साल का हूं, उस समय 13 साल का था। जब उनसे कनाडा में मिला। यह कहना है कनाडा से जयपुर प्रस्तुति देने ​आए गजल गाते हुए तबला बजाने के धनी कैसियस खान का। कनाडा में तबले की वजह से दो बार ज्यूनो अवाॅर्ड के लिए नोमिनेट हो चुके हैं। इन्हें आर्टिस्ट ऑफ द ईयर अवाॅर्ड मिल चुका है। वे बताते हैं कि पहली बार जाकिर से वेकुअर कनाडा में मिले। उनकी वर्कशॉप में हिस्सा लेने अली अकबर कॉलेज म्यूजिक सेंट फ्रांसिस्को गया था। जाकिर साहब वहां तबला सिखाते थे। मैंने उनसे तबले की तकनीक, निकास काे समझा। वो इतने सहज रूप से समझाते थे कि अगर कोई न भी बजाना जानता हो तो वे बजाना शुरू कर देगा। वो डांटते नहीं थे, सबके के साथ समान व्यवहार करते थे। एक बार कनाडा में इनके पिताजी उस्ताद अल्ला रखा खान की प्रस्तुति थी। मैं उस समय मेकडोनाल्ड में काम करता था। मैंने पैसे बचाकर महंंगी टिकट ली थी ताकि करीब से देख पाऊं। मेरे थिरकते हाथों को जब जाकिर और उनके पिता ने देखा तो मुझे बुलाया। ग्रीन रूम में तबला बजवाया और कहा- आप अच्छा बजाते हो, कुछ और टेक्नीक पर काम करोगे तो बेहतर होगा। मेरे नानाजी पंजाब से और दादी जम्मू से हैं। इंडिया में 2014 से लगातार प्रस्तुति दे रहा हूं।

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