शहर में न बारिश की कमी रही और न मौसम ने बेरुखी दिखाई, फिर भी जिम्मेदार गर्मियों के लिए पानी बचाने की चिंता जता रहे हैं। असल वजह यह है कि न तो वे बारिश का पानी सहेज पाए और न ही बर्बादी रोक सके। आसान रास्ता यह निकाला कि लोगों के हिस्से का पानी रोककर बचत की जाए, ताकि बाद में काम आ सके, लेकिन ये ही जिम्मेदार अगर तीन बिंदुओं पर काम करें तो पानी की कोई समस्या नहीं होगी। इनमें पहला है इन छह बांधों को आपस में जोड़ा जाए। दूसरा- इन बांधों में बारिश का पानी सहेजें और तीसरा- शहर में होने वाली पानी सप्लाई का ऑडिट करें। अगर जिम्मेदार यह काम सही तरीके से करें तो शहरवासियों को सालभर पानी की समस्या ही नहीं होगी। जल संसाधन विभाग इन 6 बांधों को अपनी गिनती में शामिल नहीं करता, क्योंकि उसके मुताबिक ये छोटे हैं। जिन्हें आजादी से पहले बनाया था। आजादी के बाद बने अलापुर बांध को कभी भरने का प्रयास नहीं किया गया। तीन समाधान – 1. छोटे बांध जोड़ें 2. इनमें पानी सहेजें 3. वितरण का ऑडिट करें भास्कर एक्सपर्ट – केके सारस्वत, पूर्व अधीक्षण यंत्री पीएचई शहर से सटे ये बांध जल संसाधन विभाग की गिनती में ही नहीं
अलापुर बांध में कभी पानी सहेजने का प्रयास ही नहीं किया गया। इनसेट- गर्मियों में ऐसा दिखता है बांध। जानिए…… कहां चूक और कैसे कर सकते हैं समाधान इस बार रिकाॅर्ड बारिश हुई फिर भी अफसरों को चिंता
ग्वालियर शहर में बारिश का औसत कोटा सिमटकर 30 इंच रह गया है, लेकिन इस साल बारिश का पिछले 100 सालों का रिकाॅर्ड टूट गया। पूरे सीजन में 61 इंच बारिश हुई, जो औसत बारिश के दोगुना से भी अधिक थी। सभी बांधों का पानी जल संसाधन विभाग की सीमाएं लांघकर नदी, नाले और शहर की सड़कों पर बहकर बर्बाद हो रहा था। क्योंकि इसे सहेजने का विभाग के पास कोई प्रभावी इंतजाम नहीं था। इसके बावजूद जल संसाधन विभाग के अफसर अब पानी बचाने की चिंता जताने लगे हैं। विभाग सर्दियों में एक दिन छोड़कर पेयजल सप्लाई देने के लिए पत्राचार भी शुरू कर चुका है। अफसरों की मिलीभगत से बांधों से पानी निकाल होती है खेती
शहर से सटे इन बांधों में बारिश का पानी भर भी जाए तो क्षेत्र के वे दबंग लोग पानी निकाल देते हैं, जो बांधों की जमीन पर खेती कर रहे हैं। बदले में विभाग अपने हाथ बचाने के लिए इनसे नाममात्र की रकम वसूल कर लेता है। खास बात यह है कि गर्मियों में पानी की किल्लत के बाद इतना ही पानी ऊपरी बांधों से लाने के लिए दस करोड़ रुपए तक की राशि खर्च की जाती है।


