ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने पति-पत्नी के बीच दर्ज एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति पर लगे बलात्कार (धारा 376) और अप्राकृतिक कृत्य (धारा 377) के आरोपों को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी बालिग है, तो वैवाहिक संबंधों के दौरान पति पर भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद के कारण धारा 376 लागू नहीं होती। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे वैवाहिक मामलों में धारा 377 के तहत भी अभियोजन चलाना विधिसंगत नहीं है। हालांकि कोर्ट ने यह साफ किया कि पति के खिलाफ धारा 498-ए (क्रूरता), धारा 323 (मारपीट) और धारा 294 (अश्लीलता) के आरोप बरकरार रहेंगे और इन पर ट्रायल जारी रहेगा। कोर्ट की अहम टिप्पणी हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दोहराया कि यदि पत्नी बालिग है, तो पति द्वारा उसके साथ बनाए गए यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता। साथ ही कोर्ट ने कहा कि संशोधित कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के आलोक में पति-पत्नी के बीच ऐसे मामलों में धारा 377 का प्रयोग भी उचित नहीं है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि उपलब्ध चिकित्सा साक्ष्यों से बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्य जैसे गंभीर आरोपों की पुष्टि नहीं होती। इसी आधार पर कोर्ट ने इन दोनों धाराओं के तहत दर्ज आरोपों को निरस्त कर दिया, जबकि अन्य आरोपों पर सुनवाई जारी रखने के निर्देश दिए। मुरैना के मामले से जुड़ा है प्रकरण यह मामला मुरैना जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र में दर्ज अपराध से संबंधित है। पत्नी ने अपने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना, मारपीट, बलात्कार और अप्राकृतिक कृत्य जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। पुलिस ने इन आरोपों के आधार पर चार्जशीट पेश की थी, जिस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मुरैना ने संज्ञान लिया था। इसके बाद पति ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चार्जशीट और आगे की कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि यह मामला वैवाहिक विवाद का परिणाम है और तलाक की कार्यवाही के बाद दबाव बनाने के उद्देश्य से आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया गया।


