ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने पिस्टल या रिवॉल्वर लाइसेंस जारी करने की मांग को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की 2010 की आर्म्स पॉलिसी के तहत केवल उन्हीं व्यक्तियों को लाइसेंस दिया जा सकता है, जिनके जीवन को वास्तविक, प्रमाणित और गंभीर खतरा हो। ग्वालियर निवासी कुलदीप थापक ने आत्मरक्षा के लिए हथियार लाइसेंस की मांग की थी। उन्होंने 2015 में लाइसेंस अस्वीकार करने के आदेश को चुनौती देते हुए यह याचिका दायर की थी। हालांकि, न्यायालय ने उनकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता को किसी व्यक्ति या समूह से वास्तविक खतरा है। कोर्ट ने जोर दिया कि लाइसेंस प्रदान करना पूरी तरह से प्रशासनिक विवेक का मामला है, और अदालत इस विवेक का स्थान नहीं ले सकती। याचिकाकर्ता ने इससे पहले 2010 में भी लाइसेंस के लिए आवेदन किया था, जिसे ‘थ्रेट परसेप्शन’ न होने का हवाला देते हुए राज्य शासन ने खारिज कर दिया था। उस आदेश को 2011 में हाईकोर्ट ने रद्द कर दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया था। नई सुनवाई के बाद 24 फरवरी 2015 को उनका लाइसेंस आवेदन फिर से अस्वीकार कर दिया गया था। वर्तमान याचिका इसी 24 फरवरी 2015 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके जिससे उनके जीवन पर खतरे की पुष्टि हो।


