ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उप-मानक दूध बेचने के मामले में 2 लाख रुपए के जुर्माने को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया ने स्पष्ट किया कि गाय और भैंस का दूध मिलाकर बेचना शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है, इसलिए ऐसे कृत्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह मामला सतपाल सिंह कुकरेजा की अपील से संबंधित है। उन पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 की धारा 71(6) के तहत कार्रवाई की गई थी। इससे पहले अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी एवं निर्णायक अधिकारी ग्वालियर ने सतपाल पर 2 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। जिला न्यायाधीश एवं अपीलीय प्राधिकरण ने 3 सितंबर 2025 को इस दंड को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी थी। इसी फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में यह अपील दायर की गई थी। कोर्ट में अपीलार्थी का तर्क- दूध में हानिकारक तत्व नहीं अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि खाद्य विश्लेषक की रिपोर्ट में दूध को उप-मानक इसलिए बताया गया था क्योंकि वह गाय और भैंस के दूध का मिश्रण था। हालांकि, इसमें कोई हानिकारक तत्व नहीं पाया गया था, इसलिए दो लाख रुपए का जुर्माना अत्यधिक है और इसे कम किया जाना चाहिए। राज्य शासन की ओर से अधिवक्ता सीपी सिंह ने दलील दी कि गाय का दूध सामान्यतः शिशुओं के लिए अधिक उपयुक्त और आसानी से पचने योग्य होता है। यदि कोई विक्रेता गाय के दूध के नाम पर भैंस का दूध मिलाकर बेचता है, तो यह उपभोक्ताओं, विशेषकर शिशुओं के स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है। ऐसे कृत्य को साधारण त्रुटि नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पूछा- शिशुओं के लिए कौनसा दूध दिया जाता न्यायालय ने सुनवाई के दौरान प्रश्न किया कि शिशुओं को सामान्यतः कौन-सा दूध दिया जाता है। अपीलकर्ता के वकील ने भी स्वीकार किया कि गाय का दूध अधिक सुपाच्य होने के कारण एक निश्चित उम्र तक शिशुओं को प्राथमिकता दी जाती है। इसके बाद कोर्ट ने टिप्पणी की कि गाय और भैंस के दूध का मिश्रण शिशु के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक या घातक साबित हो सकता है। अतः, उप-मानक दूध बेचने वाले के आचरण में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।


