ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने जमीन विवाद से जुड़े एक आपराधिक मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के तत्व दर्शाते हैं, इसलिए इस स्तर पर न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है और मामले का ट्रायल जारी रहेगा। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि धारा 482 के अंतर्गत निहित शक्तियों का प्रयोग अत्यंत सीमित और सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। इस प्रारंभिक चरण में आरोपों की सत्यता, चोटों की प्रकृति या गवाहों की विश्वसनीयता की जांच नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल दीवानी मुकदमे के लंबित होने मात्र से आपराधिक कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। यदि एफआईआर में आपराधिक कृत्य के तत्व परिलक्षित होते हैं, तो पुलिस जांच और न्यायिक ट्रायल को जारी रखा जाना आवश्यक है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने की थी एफआईआर निरस्त करने की मांग यह मामला पुलिस थाना चीनौर क्षेत्र से संबंधित है। याचिकाकर्ता दर्शन सिंह ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर और उससे जुड़ी समस्त आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि पक्षकारों के बीच भूमि स्वामित्व को लेकर दीवानी विवाद पहले से न्यायालय में लंबित है और उसी विवाद को आपराधिक रूप देकर झूठा मामला दर्ज कराया गया है। राज्य शासन ने कहा-याचिकाकर्ता का कृत्य आपराधिक राज्य शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि एफआईआर में 19 नवंबर 2025 की घटना का स्पष्ट उल्लेख है। आरोप है कि याचिकाकर्ताओं ने खेत और घर में जबरन प्रवेश किया, गाली-गलौज, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी। एफआईआर में प्रत्येक आरोपी की भूमिका अलग-अलग स्पष्ट रूप से दर्ज है, जो प्रथम दृष्टया आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आती है।


