घोर नक्सल इलाके की पहचान बदलने में लगी है शक्ति:महुआ को दूसरे देशों तक पहुंचा रहीं रजिया विदेशी पर्यटकों को बस्तर घुमा रहीं उर्मिला

न हम जंगली, न पिछड़े और न नक्सली हैं। हम तो अपने राज्य और बस्तर की पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की चाहत रखते हैं। इस चाहत में सफल भी हो रही है। ये कहना है माझीपाल की उर्मिला नाग और जगदलपुर की रजिया शेख का। आंखों में निर्भीकता और बुलंद आवाज के साथ बस्तर की ये महिलाएं जब बात करती हैं, तो लगता है कि यही महिला सशक्तिकरण है। दोनों ही अपने काम से छत्तीसगढ़ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला रही हैं। रजिया अपने क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं के साथ मिलकर महुआ से फूड प्रोडक्ट बनाकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा रही हैं। दूसरी तरफ, बस्तर के 35 परिवारों के छोटे से गांव माझीपाल में रहने वाली उर्मिला नाग होम स्टे के जरिए विदेशी पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। इनके होम स्टे में कई नामी विदेशी पर्यटक स्टे कर चुके है। उर्मिला ने अंग्रेजी सीखी, रजिया का जोर रिसर्च पर होम ​स्टे में ठहर चुकीं कई सेलिब्रिटीज
धुरवा समाज की 33 साल की उर्मिला नाग कुछ साल पहले तक सिर्फ हल्बी बोलती थीं। 2017 में होम स्टे शुरू करने के साथ उन्होंने हिंदी-अंग्रेजी सीखी। समाज की पढ़ी-लिखी लड़कियों के साथ मिलकर अपने होम स्टे आमचो लाडी की वेबसाइड बनाई। इसके जरिए विदेशी पर्यटक इनके होम स्टे में संपर्क करने लगे। होम स्टे में प्रसिद्ध शेफ गॉर्डन रामसे रुके और उर्मिला से चापड़ा चटनी की रेसिपी सीखकर ब्रिटेन के होटल की डिश में शामिल कर चुके हैं। कॉकटेल मेकर फ्रांस के लुकास भी आमचो लाडी होम स्टे में रुककर उर्मिला से महुआ का कॉकटेल बनाना सीख चुके है। ऑस्ट्रेलियन सेलिब्रिटी डा. जॉन जेम्स नेपियर, फ्रांस की फेमस बुक राइटर औरेलिया और मैरी क्लाउट जैसे 75 विदेशी पर्यटक वहां पहुंचते है। महुआ उत्पादों से दूसरों को रोजगार दे रहीं
जगदलपुर की 38 साल की रजिया विजयवाड़ा से माइक्रोबायोलॉजी में मास्टर डिग्री लेकर बस्तर लौटी तो सोचने लगी कि बस्तर में न्यूट्रीशन से भरपूर महुआ है, लेकिन इसके बाद भी गर्भवती महिलाओं की मृत्युदर ज्यादा है। क्यूं न महुआ की विशेषता पहले बस्तर के लोगों को बताई जाए। इन्होंने 2017 में बस्तर फूड कंपनी की शुरूआत करते हुए महुआ लड्‌डू, महुआ टी, कुकीज सहित महुआ के 36 प्रोडक्ट बनाकर लोगों के घरों तक पहुंचाए। इसे खाने पर गर्भवती महिलाओं के हीमोग्लोबिन में बढ़ोतरी हुई। इसके बाद अमेरिका से इन्हें फैलोशिप मिली। बस्तर की महिलाओं को अपनी संस्था से जोड़कर रोजगार देने लगीं, जिससे इस क्षेत्र की महिलाओं में बदलाव नजर आने लगा।। इनके उत्पाद एफएसएसएआई,आईएसओ से सर्टिफाइड हैं।

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