वुमन फॉर ट्री: नाम ऐसा, मानो पौधों और महिलाओं को एक-दूसरे का पर्याय बना दिया गया हो। केंद्र सरकार की इस योजना का दावा है कि महिलाएं पौधों की देखभाल करेंगी और बदले में आर्थिक रूप से सशक्त होंगी, जबकि पौधे पर्यावरण को मजबूत करेंगे। लेकिन छत्तीसगढ़ में इस योजना की ज़मीनी हकीकत बिल्कुल उलटी निकली है। पांच महीने में तीन करोड़ रुपए खर्च हो गए, भुगतान भी हो चुका, लेकिन कई जगहों पर पौधे दम तोड़ रहे हैं।
स्थिति यह है कि पौधे लगाने के बाद उनकी मॉनिटरिंग का कोई सिस्टम ही नहीं। उन्हें नियमित पानी देना है, देखभाल करनी है। महिला समूहों को देखभाल की जिम्मेदारी दी गई है और प्रत्येक महिला को इसके लिए आठ हजार रुपए महीना मानदेय दिया जा रहा है। इसके बावजूद पौधों की यह दुर्दशा बेदह चिंताजनक है। पिछले चार महीने में पूरे प्रदेश में लक्ष्य के करीब पौधे लगाए जा चुके हैं। इन पौधों की देखभाल के लिए महिला समूहों को 3 करोड़ रुपए का भुगतान भी हो गया है। फिर भी कई जगहों पर पौधे मर रहे हैं। राजधानी रायपुर में कमल विहार के पास इस अभियान की शुरुआत नगरीय प्रशासन मंत्री व उपमुख्यमंत्री अरुण साव, राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा, रायपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष नंद कुमार साहू, विधायक मोतीलाल साहू और रायपुर नगर निगम की महापौर मीनल चौबे की मौजूदगी में की गई थी। जिस जगह से सरकार ने हरियाली का संदेश दिया, वहीं आज आधे से ज्यादा पौधे सूखे पड़े हैं। यह स्थिति तब है, जब अभियान को शुरू हुए अभी सिर्फ चार से पांच महीने ही हुए हैं। सरकारी फाइलों में छत्तीसगढ़ हरा-भरा दिख रहा है, लेकिन ज़मीन पर सच्चाई बिल्कुल अलग मिली। दैनिक भास्कर की टीम ने कमल विहार के बोरियाखुर्द तालाब के पास लगाए गए पौधों की जांच की। सालभर में महिला समूहों को देंगे 27.48 करोड़ योजना के तहत छत्तीसगढ़ में 1.66 लाख पौधे लगाए गए हैं। इसके लिए 27.48 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया। 1701 महिला स्व-सहायता समूहों की 2300 से अधिक महिलाओं को एक साल तक देखभाल की जिम्मेदारी दी गई है। प्रत्येक समूह की एक महिला को 8 हजार रुपए मासिक मानदेय दिया जा रहा है। सरकारी दावों के मुताबिक यह योजना महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण-दोनों का मॉडल है, लेकिन दैनिक भास्कर की जांच में साफ हुआ कि योजना सिर्फ कागज़ों में सफल है। कई से छोटे-मध्यम नगरीय निकायों में पौधों की संख्या अभी लक्ष्य के लगभग 35-60% के बीच है। जैसे सुकमा, किरोड़ी, सरायपाली, बलरामपुर आदि में पूरा रोपण लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। छोटी नगर पंचायतों में पौधारोपण की स्थिति अपेक्षाकृत पिछड़ी हुई है। संसाधनों, जागरूकता या रख-रखाव तथा निरीक्षण वहां बड़ी चुनौतियां हैं। सरकारी लापरवाही का उदाहरण
राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में पौधों के 81 से 86 फीसदी सर्वाइवल रेट का दावा करती है। लेकिन वुमन फॉर ट्री अभियान की मौजूदा हालत इन आंकड़ों को पूरी तरह खोखला साबित कर रही है। अगर यही स्थिति रही, तो यह योजना हरियाली नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही का उदाहरण बनकर रह जाएगी। इसकी निगरानी सीधे केंद्र सरकार कर रही है
वुमन फार ट्री अभियान की मॉनिटरिंग के लिए सभी नगरीय निकायों में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है। उन्हें जियो टैगिंग भी करनी है। इसकी आनलाइन निगरानी सीधे केंद्र सरकार के पास है। हमने केंद्र को पत्र लिखा है कि जियो टैगिंग के तहत पौधों की मानिटरिंग के लिए हमें भी एक्सेस दिया जाए। केंद्र से आई रिपोर्ट के आधार पर तीन महीने का करीब तीन करोड़ रुपए का भुगतान नगरीय निकायों को किया गया है।
-दुश्यंत कुमार रायस्त, अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी सूडा


