चैटिंग की शॉर्ट फॉर्म स्कूल तक पहुंची, भाषा व नंबर दोनों पर असर

मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों की आदतें बदल रहे हैं। चैटिंग और मैसेजिंग में शॉर्ट फॉर्म का बढ़ता चलन अब उनकी पढ़ाई और भाषा को प्रभावित करने लगा है। शब्दों को बच्चे संक्षिप्त रूप में लिखते हैं और धीरे-धीरे यही आदत वे स्कूल असाइनमेंट और परीक्षाओं में भी दोहराने लगे हैं। इससे उनकी भाषा की शुद्धता और विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। कई मामलों में अच्छे से पढ़ने वाले बच्चों के मार्क्स इसलिए कम आए क्योंकि उन्होंने उत्तर शॉर्ट फॉर्म में लिखे। टीचर्स के मुताबिक ये एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिसे स्कूलों और घरों दोनों में गंभीरता से लिया जाना चाहिए। एजुकेटर अमन भाटिया कहती हैं कि आज की पीढ़ी टेक्नोलॉजी से जुड़ी है और यह जुड़ाव जरूरी भी है, लेकिन इससे बच्चों की भाषा और लेखन क्षमता प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है। कई बच्चे चैटिंग की आदत में इतने रम गए हैं कि उन्हें यह फर्क ही नहीं रह रहा कि कहां शॉर्ट फॉर्म ठीक है और कहां नहीं। स्कूल की उत्तर पुस्तिका, निबंध लेखन या प्रतियोगिताओं में भाषा की स्पष्टता और प्रभाव सबसे ज्यादा मायने रखती है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों को ब्रीफ में नहीं, क्लियर में लिखने की आदत सिखाएं। बच्चों को सिर्फ मोबाइल से दूर करना काफी नहीं, उन्हें लेखन की नियमित प्रैक्टिस देनी होगी। स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें और हर दिन थोड़ा-थोड़ा लिखने की आदत डलवाएं। केस 1 : समझाने के बाद भी शॉर्ट फॉर्म नहीं छोड़ी, नंबर कम आने पर हुआ खुलासा : नौवीं कक्षा के एक छात्र ने क्लास में हर उत्तर को शॉर्ट फॉर्म में लिखना शुरू कर दिया था। टीचर ने कई बार टोका, लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया। पेरेंट्स को बताया गया, लेकिन उन्होंने भी इसे नजरअंदाज किया। पढ़ने में तेज होने के बावजूद उसके मार्क्स कम आए। बाद में कॉपियां जांचने पर पता चला कि उसने उत्तर शॉर्ट फॉर्म में दिए थे, जिससे टीचर्स को उसकी बात समझ नहीं आई और नंबर काट दिए गए। केस 2 : साइंस के जवाबों में भी अब्रिविएशन, टीचर ने काटे नंबर : एक 11वीं का छात्र साइंस विषय में लगातार शॉर्ट शब्दों का उपयोग कर रहा था। जैसे फोटोसिंथेसिस को पीएस और रोज प्लांट को सिर्फ आर्ज़ लिखना उसकी आदत बन गई थी। टीचर ने जब उत्तर जांचे तो विषय का मीनिंग ही बदल गया और उसे कई सवालों में जीरो मार्क्स मिले। टीचर ने पेरेंट्स को बुलाकर बताया कि अगर ये आदत न सुधारी गई तो भविष्य में यह और बड़ी दिक्कत बन सकती है। केस 3 : स्क्रीन टाइम घटा, तो बच्चे ने दोबारा पकड़ी सही भाषा की पकड़ : आठवीं कक्षा का एक होशियार छात्र क्लास में सवालों के जवाब देने में अच्छा था, लेकिन जब लिखने बैठता, तो हर बार शॉर्ट फॉर्म का सहारा लेने लगा। टीचर ने कई बार समझाया, लेकिन आदत बनी रही। फिर एक दिन उसने खुद पेरेंट्स से कहा कि मुझे ये आदत परेशान कर रही है, मैं ठीक से लिख नहीं पा रहा। पेरेंट्स ने तुरंत उसका स्क्रीन टाइम सीमित कर दिया और रोज आधे घंटे उसे लेसन पढ़कर लिखवाने की आदत डाली। शुरुआत में मुश्किल हुई, लेकिन कुछ ही हफ्तों में सुधार दिखने लगा।

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