चैत्र नवरात्रि की शुरुआत…गज पर सवार होकर आईं देवी मां:डोंगरगढ़ में 10 ट्रेनों का स्टॉपेज; जानिए छत्तीसगढ़ के 5 शक्तिपीठों की व्यवस्था

चैत्र नवरात्रि की शुरुआत आज से हो गई है। छत्तीसगढ़ में भी देवी मंदिरों में उत्साह के साथ श्रद्धालु दर्शन करने पहुंच रहे हैं। इस बार देवी मां गज पर सवार होकर आ रही है। ऐसे में इस नवरात्र को कई तरह से सुख समृद्धि व कई मायनों में लाभकारी मान रहे हैं। पंडित धीरजकृष्ण शर्मा ने बताया कि, इस बार अमृत योग है और माता रानी गज (हाथी) पर सवार होकर आ रही हैं। चैत्र नवरात्रि में सर्वार्थ योग बन रहा है और पंचक समाप्त हो रहा है। इससे सुख समृद्धि और अतिवृष्टि साल भर रहेगी और यह साल भी अच्छा रहेगा। इन मंदिरों में इस साल चैत्र नवरात्रि में क्या खास है, श्रद्धालुओं को क्या सुविधाएं मिलेंगी, दर्शन-पूजन और ज्योति कलश की क्या व्यवस्थाएं हैं, पढ़िए इस रिपोर्ट में… मां महामाया 52 शक्ति पीठों में से एक है बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित महामाया मंदिर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती को समर्पित है। ये 52 शक्ति पीठों में से एक है। देवी महामाया को कोसलेश्वरी के रूप में भी जाना जाता है, जो पुराने दक्षिण कोसल क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। अब जानिए डोंगरगढ़ में पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी के बारे में मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर आस्था का केंद्र डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर आस्था का केंद्र है। बड़ी बम्लेश्वरी के समतल पर स्थित मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। बम्लेश्वरी शक्ति पीठ का इतिहास करीब 2000 वर्ष पुराना है। इसे वैभवशाली कामाख्या नगरी के रूप में जाना जाता था। मां बम्लेश्वरी को मध्य प्रदेश के उज्जयिनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी भी कहा जाता है। इतिहासकारों ने इस क्षेत्र को कल्चुरी काल का पाया है। मंदिर की अधिष्ठात्री देवी मां बगलामुखी हैं। उन्हें मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। उन्हें यहां मां बम्लेश्वरी के रूप में पूजा जाता है। मां बम्लेश्वरी देवी के भक्तों के लिए बढ़ाई गई ट्रेन सुविधाएं अब जानिए चंद्रपुर की मां चंद्रहासिनी के बारे में सक्ती जिले के चंद्रपुर की छोटी सी पहाड़ी के ऊपर विराजित है मां चंद्रहासिनी। मान्यता है कि देवी सती का अधोदन्त (दाढ़) चंद्रपुर में गिरा था। यह मां दुर्गा के 52 शक्ति पीठों में से एक है। यहां बनी पौराणिक और धार्मिक कथाओं की झाकियां, करीब 100 फीट विशालकाय महादेव पार्वती की मूर्ति आदि आने वाले श्रद्धालुओं का मन मोह लेती है। काले पत्थर से तराश कर बनाई गई मां दंतेश्वरी की मूर्ति देश के 52 शक्ति पीठों में से एक दंतेश्वरी मंदिर है। मान्यता है कि यहां देवी का दांत गिरा था। 14वीं शताब्दी में बना यह मंदिर दंतेवाड़ा में स्थित है। मां की मूर्ति काले पत्थर से तराश कर बनाई गई है। मंदिर को चार भागों में विभाजित किया गया है। गर्भगृह और महा मंडप का निर्माण पत्थर के टुकड़ों से किया गया था। मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने एक गरुड़ स्तंभ है। मंदिर खुद एक विशाल प्रांगण में स्थित है जो विशाल दीवारों से घिरा हुआ है। शिखर को मूर्तिकला से सजाया गया है। मां दंतेश्वरी टेंपल कमेटी ने एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है। मंदिर से जुड़ी जानकारी 8360401008 नंबर पर कॉल कर भक्त ले सकते हैं। अंबिकापुर का नाम ही महामाया अंबिका देवी के नाम पर है। किवदंति है कि महामाया का सिर रतनपुर और धड़ अम्बिकापुर में है। माता की प्रतिमा छिन्न मस्तिका है। महामाया के बगल में विंध्यवासिनी विराजी हैं। विंध्यवासिनी की प्राण प्रतिष्ठा विंध्याचल से लाकर की गई है। शारदीय नवरात्र में छिन्न मस्तिका महामाया के शीश का निर्माण राजपरिवार के कुम्हार हर साल करते हैं। जिस प्रतिमा को मां महामाया के नाम से लोग पूजते हैं, पहले इनका नाम समलाया था। महामाया मंदिर में ही दो मूर्तियां स्थापित थी। पहले महामाया को बड़ी समलाया कहा जाता था और समलाया मंदिर में विराजी मां समलाया को छोटी समलाया कहते थे। बाद में समलाया मंदिर में छोटी समलाया को स्थापित किया गया, तब महामाया कहा जाने लगा। अब जानिए अंचल की देवियों के बारे में… यह मंदिर कोरेश के जमींदार परिवार ने बनवाया था। त्रिलोकी नाथ मंदिर, काली मंदिर और ज्योति कलश भवन से घिरा हुआ है। वहां भी एक गुफा है, जो नदी के नीचे जाती है और दूसरी तरफ निकलती है। गंगरेल में 52 गांव डूबने के बाद मां अंगार मोती माता की स्थापना की गई थी। माता के चरण पादुका मंदिर में अभी भी विराजित है। रायपुर से 80 किमी दूर गरियाबंद जिले में स्थित जतमई माता के मंदिर से सटी जलधाराएं उनके चरण स्पर्श करती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार ये जलधाराएं माता की दासी होती हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के शीर्ष पर, एक पौराणिक पात्रों का चित्रण भित्ति चित्र देख सकते हैं। मां जतमई की पत्थर की मूर्ति गर्भगृह में स्थापित है। महासमुंद जिले के बागबहारा घुंचापाली में मां चंडी का मंदिर स्थित है। किंवदन्ती है कि करीब 150 साल पहले ये तंत्र-मंत्र की साधना स्थल हुआ करता था। यहां महिलाओं का जाना प्रतिबंधित था। प्राकृतिक रूप से माता चंडी के स्वरूप में शिला (पत्थर) ने आकार लिया। वैदिक रीति रिवाज से पूजा-अर्चना शुरू हो गई। इसके बाद महिलाओं का चंडी माता की पूजा करने का प्रतिबंध समाप्त हुआ। महासमुंद जिले में ही 24 किलोमीटर दूरी पर ये मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है। प्राचीन काल में इसे खलवाटिका कहा जाता था। करीब 850 सीढ़ियां चढ़कर माता के दर्शन होते हैं। बरफानी धाम राजनांदगांव शहर में स्थित है। मंदिर के शीर्ष पर एक बड़ा शिवलिंग देखा जा सकता है। उसके सामने एक बड़ी नंदी प्रतिमा है। मंदिर तीन स्तरों में बनाया जाता है। नीचे की परत में पाताल भैरवी का मंदिर है, दूसरे में नवदुर्गा या त्रिपुर सुंदरी और ऊपरी स्तर में भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमा है।

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