चैत्र नवरात्र में धमतरी पहुंचे 18 जैन संत:5 साल बाद दूसरी बार आगमन, नवपद ओली की करेंगे आराधना

छत्तीसगढ़ के धमतरी में 18 जैन साधु-साध्वियों का आगमन हुआ है। समाज के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। साधु-साध्वी चैत्र नवरात्र तक धमतरी में प्रवास करेंगे। इस दौरान जैन समाज के लोग नवपद ओली पर्व की आराधना करेंगे। यह 5 साल बाद दूसरी बार है, जब जैन गुरुजनों का जिले में आगमन हुआ है। नवरात्र के पूरे समय में जैन समाज के घरों में हरी सब्जियों का प्रयोग नहीं किया जाएगा। इस दौरान समाज के लोग आयंबिल तप भी करेंगे। धमतरी शहर के जैन समाज ने साधु-साध्वियों का बड़े धूमधाम से स्वागत किया। साधु-साध्वी के स्वागत में बच्चों ने खुद बैंड बाजा बजाकर और स्केटिंग से डांस करते हुए गुरुजनों का भव्य स्वागत किया। सभी गुरुजन कैवल्य धाम से सीधे धमतरी पहुंचे, जहां समाज के लोगों ने उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। वहीं महिलाएं अपने सिर पर कलश लेकर आगे बढ़ती रही। इस मौके पर महिलाएं एक ही ड्रेस कोड में नजर आईं। बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिला। बच्चों ने शहर के अलग-अलग जगहों पर भगवान महावीर स्वामी के जीवन पर आधारित नृत्य प्रदर्शन किया। महिला समाज में विशेष उत्साह समाज की महिलाओं ने बताया कि जैन संतों के आगमन से वे अत्यंत प्रसन्न और उत्साहित हैं। धमतरी को साधु-संतों द्वारा “धर्म तराई” के नाम से जाना जाता है। नवपद ओली आराधना के अंतर्गत अध्यात्म योगी परम पूज्य उपाध्याय प्रवर श्री महेंद्र सागर जी महाराज और युवा मनीषी परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज के सानिध्य में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। गुरुजनों की पावन निश्रा में नवपद ओली की भव्य आराधना संपन्न होगी, साथ ही महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव का आयोजन भी किया जाएगा। नवपद ओली: आत्मशुद्धि का पर्व नौ दिनों तक सुबह स्वाध्याय, प्रवचन और फिर युवाओं, महिलाओं एवं बच्चों को जोड़ने के लिए विशेष शिविर आयोजित किए जाएंगे। समाज के वरिष्ठ सदस्य शिथिर सेठिया और विजय गोलछा ने बताया कि गुरुजनों के आगमन से पूरे संघ में हर्षोल्लास का वातावरण है। नवपद ओली एक शाश्वत पर्व है, जो वर्ष में दो बार आता है। चैत्र मास में मनाया जाने वाला यह पर्व उत्सव से अधिक एक विशिष्ट आराधना का पर्व है। इस दौरान छः प्रकार की वस्तुओं घी, तेल, दूध, दही, कढ़ी और मिठाई का पूर्णतः त्याग किया जाता है। साथ ही, जैन समाज के घरों में हरी सब्जी और फल-फ्रूट भी नहीं लाए जाते। इस पर्व में सिद्धचक्र की आराधना की जाती है और इसे आयंबिल तप के साथ संपन्न किया जाता है। सांसारिक आसक्ति से मुक्ति का संदेश गुरुजनों ने बताया कि यह पर्व हमें सांसारिक भोगों में फंसे रहने के बजाय आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है। परमात्मा द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर हम भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति को त्याग सकते हैं। सुदेव, सुगुरु और सुधर्म को अपनाकर हम भोग के रोग से मुक्त होकर आत्मा की शुद्धि की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। आत्मा को भय और बंधनों से मुक्त कर परमात्मा स्वरूप बनाने के प्रयास हेतु ही यह शाश्वत ओली पर्व मनाया जाता है।

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