छिंदवाड़ा में सांई बाबा के पादुका के होंगे दर्शन:127 साल पहले निमोणकर ​​​​​​​परिवार को सौंपी थी चरणपादुका; 23 फरवरी को होगा महोत्सव

छिंदवाड़ा में स्थित विवेकानंद साईं मंदिर अपनी 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर 23 फरवरी को एक आयोजन करने जा रहा है। इस अवसर पर शिर्डी के साईं बाबा की 127 साल पुरानी चरण पादुकाओं के दर्शन कराए जाएंगे। मंदिर समिति के प्रमुख आनंद बक्शी ने जानकारी दी कि सच्चिदानंद सेवा समिति की ओर से विवेकानंद कॉलोनी स्थित शिर्डी साईं मंदिर में भव्य रजत महोत्सव मनाया जा रहा है। यह महोत्सव 20 नवंबर से शुरू हुआ है, जिसमें भजन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में 23 फरवरी को साईं बाबा के भक्तों को बाबा की पवित्र पादुकाओं के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा। यह पादुकाएं नानासाहब निमोणकर को स्वयं साईं बाबा ने प्रदान की थीं। 1999 में हुआ था विवेकानंद कॉलोनी के मंदिर का निर्माण मंदिर समिति के प्रमुख आनंद बक्शी ने बताया कि विवेकानंद साईं मंदिर का निर्माण वर्ष 1999 में किया गया था। इस दौरान सच्चिदानंद सेवा समिति ने साईं बाबा की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करवाई थी। इस साल मंदिर की रजत जयंती को भव्य रूप से मनाने के लिए विभिन्न धार्मिक आयोजनों की योजना बनाई गई है। निमोणकर परिवार के पास हैं पादुकाएं साईं बाबा की पादुकाएं वर्तमान में नानासाहब निमोणकर की चौथी पीढ़ी के पास सुरक्षित हैं। नानासाहब निमोणकर शिर्डी के समीप स्थित निमोण गांव के निवासी थे और वे बाबा के परम भक्तों में से एक थे। कैसे मिली साईं बाबा की पादुकाएं? कौन थे निमोणकर? शिर्डी साईं बाबा की चरण पादुकाएं भक्तों के लिए गहन आस्था और श्रद्धा का केंद्र हैं। भारत के अलग-अलग हिस्सों में इन पादुकाओं के दर्शन और पूजन के लिए लाखों भक्त उमड़ते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो साईं बाबा ने स्वयं ये पादुकाएं अपने परम भक्त शंकरराव रघुनाय देशपांडे को को 1898 में प्रदान की थीं। जिन्हें नानासाहब निमोणकर के नाम से जाना जाता है। हेमाडपंत द्वारा लिखित ‘साईं सच्चरित्र’ ग्रंथ में भी इन पादुकाओं का उल्लेख किया गया है। नानासाहब निमोणकर की पहली मुलाकात साईं बाबा से 1890 में हुई थी और 1891 में उन्होंने शिर्डी आकर बाबा की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। वे बाबा को प्रेमपूर्वक “देवा” कहकर पुकारते थे। साईं बाबा के परम भक्त निमोणकर नानासाहब निमोणकर शिर्डी में आकर बसने वाले प्रथम भक्तों में से एक थे। उन्होंने अपनी संपत्ति और ऐश्वर्य को त्यागकर बाबा की शरण में जीवन व्यतीत करने का निर्णय लिया। उनका पैतृक गांव निमोण, शिर्डी से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसके कारण उनका नाम “नानासाहब निमोणकर” पड़ा। वर्तमान में उनकी चौथी पीढ़ी के सदस्य, नंदकुमार निमोणकर, इन पादुकाओं को मूल स्वरूप में संजोए हुए हैं।

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