भास्कर न्यूज | कोरबा दीनदयाल मार्केट स्थिति पीली कोठी परिसर में आयोजित 9 दिवसीय श्रीराम कथा का शनिवार को समापन हो गया। शंभू शरण लाटा महराज ने कथा में बताया कि बड़ा बनना है तो बन जाओ, लेकिन छोटा बनना पड़े तो संकोच मत करना। छोटा बनने से आशीर्वाद मिलता है और आशीर्वाद से ही मानव का कद बड़ा होता है। इस कथा में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और प्रभु श्रीराम के आदर्श जीवन से शिक्षा प्राप्त किए। कथा के मुख्य आयोजक रितेश गुप्ता, कैलाश गुप्ता, दीपक अग्रवाल, आशीष बत्रा व महेश अग्रवाल थे। कथा के दौरान राम जन्मोत्सव, सीता-विवाह, शिव-विवाह, पुष्पवाटिका प्रसंग, केवट संवाद, श्रवण कुमार, भरत चरित्र, सीता हरण, राम वनवास और शबरी प्रसंग का वर्णन आचार्य ने व्यास पीठ सी की। कथा के अंतिम दिन सुंदरकांड का प्रसंग सुनाया गया और भगवान श्रीराम की भक्ति में लीन हनुमान जी के कर्म प्रधान और भक्ति प्रधान की संगीतमय कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि राम की शांति शास्वत है। उन्होंने प्रसंगों के माध्यम से कहा कि अच्छा काम करने से अहम का भाव नहीं आता। राम के काम बिना आराम कहां… हनुमान की भक्ति में शक्ति का वर्णन करते हुए लाटा महराज ने कहा कि सीता की खोज में जब हनुमान जी लंका पहुंचे, इसके पूर्व सुरसा सहित कई बड़े राक्षसों, राक्षसियों का सामना किया। कहीं बल प्रयोग किया और कहीं बुद्धि का। कभी विराट रूप से राक्षसों का संहार किया तो, कहीं सूक्ष्म रूप से बुद्धि का प्रयोग किया और सीता मैय्या तक पहुंचे। सीता मां ने हनुमान को अंगूठी दी और हालचाल लेकर भगवान श्रीराम को सीता मैय्या की कथा सुनाई। सीता का हालचाल लाकर हनुमान जी ने भगवान श्रीराम को जीवन का सबसे सुखद समाचार बताया, तब राम ने हनुमान को गले लगाया और कहा कि पूरे ब्रम्हांड में तुमसा मेरा कोई प्रिय नहीं। सुंदरकांड के दिव्य प्रसंगों से श्रोता कभी गर्व महसूस करते थे, तो कभी आंखों में अश्रु बहने लगते। सुंदरकांड की कथा से रामकथा पर विराम लगा। ज्ञात हो ति पंडित शंभू शरण लाटा का जन्म कोलकाता में हुआ। उनके पिता पंडित दुर्गादत्त लाटा और दादा पंडित जमुनाघर लाटा न्यायशास्त्र एवं भागवत पुराण के प्रसिद्ध विद्वान थे। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज से दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात तथा संत मुरारी बापू की कथा सुनने के बाद उन्हें रामकथा सेवा की प्रेरणा मिली।


