जिला मुख्यालय कवर्धा से करीब 55 किलोमीटर दूर चिल्फी घाटी से महज 6 किमी दूरी पर वनग्राम बेंदा है। यहां साल के पेड़ों से घिरे जंगल के बीच टीले पर प्राचीन शिव मंदिर के अवशेष बिखरे पड़े हैं। मकर संक्रांति पर 14 जनवरी को यहां भव्य मेला लगेगा, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यहां एक मुख्य शिव मंदिर के अलावा 4 अन्य मंदिर थे, जो भोरमदेव के समकालीन बने थे। लेकिन अब यहां मंदिरों के ध्वंसावशेष बिखरे पड़े हैं।
वनग्राम बेंदा में जंगल के बीच टीले पर कथित 11वीं शताब्दी में प्राचीन शिव मंदिर बना था। यह मंदिर चौरा गांव में स्थित भोरमदेव के समकालीन था। यह मंदिर करीब 150 वर्गफीट (15 वर्ग मीटर) क्षेत्र में बना था। बताया जाता है कि मंदिर की आकृति भोरमदेव से मिलती-जुलती थी। लेकिन इसे भोरमदेव जैसी ख्याति नहीं मिली पाई। संरक्षण का आभाव और भौगोलिक कारणों से मंदिर ध्वस्त हो चुका है। मंदिर के अवशेष वहीं बिखरे पड़े हैं। बेंदा के जंगल में आज भी प्राचीन शिव मंदिर के ध्वंसावशेष पड़े हुए हैं। पत्थरों को तलाश कर बनाई गई मंदिर की कलाकृतियों के नमूने यहां अवशेषों में देखने को मिलते हैं। यहां प्राचीन जलहरि शिवलिंग है, जो सुरक्षित है। स्थानीय लोग विभिन्न अवसरों पर इसकी पूजा करते हैं।


