जटिल सर्जरी कर मरीज का पैर कटने से बचाया:एक्सीडेंट में जांघ की हड्‌डी 23 इंच टूटकर गिरी, डॉक्टरों ने पानी में उबाला और दोबारा फिट कर दिया

प्रदेश के सबसे बड़े डॉ भीमराव अम्बेडकर अस्पताल के डॉक्टर्स ने बेहद जटिल सर्जरी कर एक मरीज का पैर कटने से बचा लिया। दरअसल, धुर नक्सली इलाके बीजापुर के बैरमगढ़ में 24 जनवरी को बाइक और स्कूटी की टक्कर हुई। इसमें स्कूटी चलाने वाले को मामूली चोट आई। जबकि पीछे बैठे 23 साल के जगन्नाथ वेंजाम के दाहिने पैर में ऐसी चोट आई कि जांघ से घुटनों के बीच की हड्‌डी टूटकर 23 इंच लंबा टुकड़ा सड़क पर उछल गया। जगन्नाथ को तुरंत बैरमगढ़ के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। परिजन साथ में हड्‌डी का टुकड़ा भी ले गए। इसे डाक्टरों ने बर्फ में रखवाया। जगन्नाथ को वहां से दंतेवाड़ा फिर जगदलपुर अस्पताल ले जाया गया। करीब 24 घंटे बाद उसे रायपुर के अंबेडकर अस्पताल पहुंचाया गया। यहां डॉक्टरों ने 72 घंटे बाद हड्‌डी को वापस जगन्नाथ की जांच में फिट कर दिया। हड्डी जोड़ने के बारे में डाॅ. राजेंद्र अहिरे, डाॅ. अतिन कुंडू और डाॅ. सुभाष जिंदल ने बताया कि हमने 48 घंटे तक डिस्कशन-रिसर्च की। इनका दावा है दुनिया में इतनी लंबी हड्‌डी के टुकड़े को दोबारा जोड़ने की ये दूसरी सर्जरी है। 1962 में इंग्लैंड में इतनी लंबी हड्‌डी को जोड़ा गया था।
तीनों ने सर्जरी को कैसे अंजाम दिया, उन्हीं की जुबानी… दुनिया में ऐसा दूसरी बार जब शरीर से अलग इतनी लंबी हड्डी जोड़ी गई, इंग्लैंड में ऐसा 63 साल पहले हो चुका जगन्नाथ को 25 जनवरी की रात लगभग 2 बजे अंबेडकर अस्पताल लाया गया। अगले दिन 26 जनवरी की छुट्‌टी थी। पर सुबह ही जूनियर का फोन आया और केस के बारे में बताया। तब सभी डॉक्टर अस्पताल पहुंचे। पैर जांघ से घुटने के बीच मांस पर अटका था। ऐसे में पहली नजर में पैर काटना ही विकल्प था। पर उसकी उम्र देखकर अपने एचओडी डॉक्टर रविकांत दास से बात की। उन्होंने कहा- डिस्क्शन शुरू करें। फिर हमने रिसर्च शुरू की। कोयंबटूर के गंगा ट्रॉमा सेंटर में 11 इंच लंबी हड्‌डी के टुकड़े को जोड़ने का केस मिला। फिर इंटरनेट को खंगाला तो 1962 में इंग्लैंड में हुई सर्जरी का ब्योरा मिला। उसमें भी 23 इंच की हड्‌डी दोबारा जोड़ी गई थी। जगन्नाथ की भी इतनी ही लंबी हड्डी टूटकर अलग हुई थी। कुछ विशेषज्ञों से राय लेकर तय किया कि हम सर्जरी कर हड्डी जोड़ेंगे। हालांकि सैप्टिक होने का खतरा था। हमने ऑटो क्लेव सिस्टम अपनाया। इसमें स्टील की प्लेट और स्क्रू लगाने के पहले हम उसे 180 डिग्री तापमान में आधा घंटे उबालते हैं। हड्‌डी को हमने 120 डिग्री में 15 मिनट उबाला। उसके बाद ऑपरेशन शुरू किया। हड्‌डी के साइज के आकार का प्लेट का हिस्सा काटा गया। एक-एक लेयर की मांस पेशियों को हटाने के बाद हड्‌डी के टुकड़े को उसकी पुरानी जगह पर फिक्स किया। उसे सहारा देने के लिए प्लेट फिट की। इस दौरान खून की नसों और धमनियों की सुरक्षा जरूरी थी। इसमें इंजुरी होने पर होने पर रक्त का प्रवाह बंद हो सकता था। हड्‌डी फिक्स करने के बाद पहले मांस वाली लेयर को उसकी पोजीशन पर सेट किया गया। फिर चमड़ी को स्टिच किया गया। सर्जरी के बाद मरीज को निगरानी में रखा गया। हमें इंतजार था उसकी हडि्डयों में वापस रक्त प्रवाह चालू होने का। एक हफ्ते बाद हमें इसका इंडिगेशन मिला। हमारी सर्जरी सफल रही। एक-दो दिनों में मरीज की छुट्‌टी हो जाएगी। जगन्नाथ बेहद खुश है। अब वो परिजन का सहारा लेकर चलने लगा है। बीजापुर के सरकारी स्कूल में गार्ड का काम करने वाले जगन्नाथ ने बताया कि जब हादसा हुआ तो उसे पता नहीं चला,क्या हुआ है। पैर से खून निकल रहा था। पर जब हड्‌डी अलग देखी तो बेहोश हो गया। फिलहाल उसकी पत्नी और बच्चे भी उसके साथ हैं।डाक्टर उसकी सर्जरी का पूरा प्रेजेंटेशन बनाया है। वे इसे अलग-अलग जगह भेजेंगे।’
(जैसा डाॅ. राजेंद्र अहिरे, डाॅ. अतिन कुंडू और डाॅ. सुभाष जिंदल ने भास्कर को बताया)

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