जमीन विवाद में दलितों के घरों पर हमला कर मारपीट, आगजनी और हिंसा के मामले में 16 नामजद आरोपियों को कोर्ट ने दोषी करार दिया है। आरोपियों को कठोर कारावास और जुर्माने से दंडित किया गया है। वहीं 3 की मौत होने से उनके खिलाफ कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया है। फैसला एससी/एसटी विशिष्ट न्यायाधीश गरिमा सौदा ने सुनाया। मामला जोधपुर ग्रामीण क्षेत्र के पड़ासला में 31 जनवरी 2012 की रात का है। कोर्ट ने दोषियों को ये दी सजा चार्जशीट के साथ 54 दस्तावेज कोर्ट में पेश
पुलिस में प्रार्थी पोकरराम ने शिकायत दी थी कि 31 जनवरी 2012 को रात 11:30 बजे दो कैंपर और एक जीप में 20-25 लोग गांव के मेघवालों के मोहल्ले में गए थे। उन्होंने ‘घर छोड़ो, ये जमीन हमारी है’ का नारा लगाया था। लोगों के विरोध करने पर दुकान, झोपड़ी, केबिन और घरों में तोड़फोड़, आगजनी, मारपीट व पत्थरबाजी की थी। घटना में पीड़ित परिवारों का लाखों का सामान जल गया और कई सदस्य घायल हो गए थे। आरोप है कि पूनाराम ने मौके पर अवैध बंदूक से फायर किया। पुलिस के 6 आरोपियों को मौके पर पकड़ लिया था। इसके साथ ही पुलिस ने जांच कर चार्जशीट के साथ मेडिकल रिपोर्ट, फोटोग्राफी, अवैध हथियार बरामदगी सहित कुल 54 दस्तावेज कोर्ट में पेश किए थे। कोर्ट में पुख्ता सबूत किए पेश
प्रकरण में विशिष्ट लोक अभियोजक अजय कुमार व्यास, एडवोकेट बी.आर. चौधरी और वकील किशन मेघवाल ने पैरवी की। सुनवाई में अभियोजन ने गवाही, डॉक्टर रिपोर्ट, घटना स्थल के नक्शे, फोटोग्राफ, घायल प्रतिवेदन और बरामद हथियार सहित हर सबूत प्रस्तुत किया। सबसे अहम गवाह-पीड़ित परिवार के सदस्य, स्वतंत्र गवाह, और पुलिस कर्मचारी-सभी ने घटना के समय, कब्जे, मारपीट और आगजनी की पुष्टि की। बचाव पक्ष ने जमीन विवाद, पक्षधरता, बरामदगी में संदेह व फर्जी मुकदमे की दलीलें रखीं। कोर्ट ने पाया कि ‘घटना स्थल वास्तव में परिवादी पक्ष के कब्जे में था’, झोपड़ी व केबिन कब्जे वाली जमीन पर बने थे, पूनाराम के घर से अवैध बंदूक बरामद हुई और घायल प्रतिवेदन चिकित्सा प्रमाणित थे। दोषियों को सजा, एससी/एसटी एक्ट की धारा अस्वीकार
कोर्ट ने आईपीसी की अलग-अलग धाराओं व पूनाराम को आयुध एक्ट की धारा 27 में दोषी पाया। एससी/एसटी एक्ट-जातिसूचक गालियां, अत्याचार, बेदखली, सार्वजनिक अपमान के आरोप अदालत ने साक्ष्य के अभाव में अस्वीकार किए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि- मामूली विरोधाभास, गवाहों की आपसी रिश्तेदारी या पुरानी रंजिश के आधार पर अभियोजन को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट के फैसले के पांच बिंदू 1. कोर्ट ने माना- गांवों में विवाद से जुड़े मामलों में गवाह प्रायः पक्षधर होते हैं लेकिन केवल इस आधार पर सभी साक्ष्यों को नकारना ग्रामीण समाज की हकीकत से आंख मूंदना होगा। ऐसे मामलों में गंभीर विश्लेषण जरूरी है। कोर्ट ने मामूली विरोधाभास को साक्ष्य खारिज करने का आधार नहीं माना बल्कि मोटे तौर पर मिली सुसंगतता और मेडिकल रिपोर्टों की पुष्टि वाली गवाही को स्वीकार किया। कोर्ट ने कहा- प्रत्यक्षदर्शी और घायल गवाहों की गवाही सामान्यतः भरोसेमंद मानी जाती है, जब तक उनके झूठे होने के सशक्त आधार न हों। 2. कोर्ट ने पाया कि विवादित स्थल पर घटना के समय परिवादी (पीड़ित) पक्ष का कब्जा था। दोनों पक्षों के बीच भूमि स्वामित्व को लेकर सिविल विवाद लंबित है लेकिन आपराधिक कोर्ट को सिर्फ कब्जे और घटना के सीधे संबंध की विवेचना करनी थी। 3. कोर्ट ने साफ बताया-सिर्फ इस कारण कि पीड़ित अनुसूचित जाति से हैं और आरोपी सवर्ण, इसका अपराध से सीधा संबंध प्रमाणित होना जरूरी है। ‘जाति के आधार पर’ अपमान, बेदखली, आगजनी-इन आवश्यक तत्वों की पूर्ण प्रमाणिकता आदेश के मुताबिक नहीं आई; इसलिए SC/ST एक्ट की धाराओं में दोष सिद्ध नहीं हुआ। 4. कोर्ट ने नक्शा मौका, घटना स्थल में बने हुए झोंपड़ों, केबिन, घरेलू सामान, फोटोग्राफी व मौके से जब्त वाहनों, हथियारों की पुष्टि की। सभी मुख्य प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस गवाही की पुष्टि पाई गई। 5. कोर्ट ने कहा- गंभीर अपराध होने पर, अपराध की प्रकृति के आधार पर ही सजा का निर्धारण उचित है। पीड़ित या आरोपी की सामाजिक स्थिति इसकी अवधि निर्धारित करने का आधार नहीं हो सकता। अपराध के महत्त्व, सबूतों की शक्ति, और कानून के अनुपालन को ध्यान में रखते हुए सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी और न्यायिक अभिरक्षा का समायोजन होगा। 6. कोर्ट ने टिप्पणी की कि ग्रामीण झगड़ों, सामूहिक बलवा के मामलों में बड़े समूह के अभियुक्तों की भूमिका पर ‘सामान्य उद्देश्य’ का सिद्धांत लागू होगा। व्यक्तिगत भूमिका का सटीक उल्लेख गवाहों की ओर से संभव नहीं होता इसलिए समग्र सबूत को देखना उचित है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर यह जोर दिया कि भीड़ मामले में गवाहों से पूरी सटीकता की अपेक्षा अनुचित है।


