जयवंश महाकाव्य का ऐतिहासिक साक्ष्य; सीताराम भट्ट के अनुसार जयपुर का मूल रंग गुलाबी नहीं, श्वेत था

जीवनयात्रा; माधव भट्ट के ही वंशज सीताराम पर्वणीकर ने 19 सर्गों (अध्यायों) में आमेर राज्य के आदिपुरुष सोढ़देव से सवाई जयसिंह तृतीय तक जयपुर का इतिहास विशद रूप में संस्कृत में लिखा। जयपुर बसने के बाद सन 1828 में पंडित सीताराम भट्ट पर्वणीकर द्वारा रचा जयवंश महाकाव्य अनेक अल्पज्ञात तथ्यों को सामने लाता है। इसमें आया है कि आमेर में माधव भट्ट पर्वणीकर ने पर्दे के बाहर से रानियों को संस्कृत पढ़ाई। इससे रानियों को शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त हुआ। माधव भट्ट के ही वंशज सीताराम पर्वणीकर ने 19 सर्गों (अध्यायों) में आमेर राज्य के आदिपुरुष सोढ़देव से सवाई जयसिंह तृतीय तक जयपुर का इतिहास विशद रूप में संस्कृत में लिखा। जयवंश महाकाव्य के 12वें सर्ग में आया है कि जयपुर बसने के समय सारे मकान सफेद रंग से पुते होते थे- गृहाणि यत्र स्फटिकोपलानां स्वच्छानि संस्पृष्टविधूनि रेजुः। सुधासिता यत्र गृहा विरेजुर्विधुस्पृशः सच्छिवयोगभाजः॥ तात्पर्य है कि घर सफेदी से पुते थे और इतने ऊंचे बहुमंजिले थे कि चंद्रमा तक पहुंचते थे। स्पष्ट है कि जयपुर गुलाबी नगर या पिंक सिटी काफी बाद में बना है। जयवंश महाकाव्य में तालकटोरा का मनोरम वर्णन है। वज्रट्रंक, शेष और भीमपुरनाथ महंतों के साथ ही मार्कंडेय, द्रोण नामक सिद्ध संतों और कमलाकर वेदपाठी का चमत्कारी वर्णन है। पर्वणीकर ने जयपुर के चार पोलों – सूरजपोल, किशनपोल, चांदपोल तथा गंगापोल का ही वर्णन किया है, बाकी का नहीं। उन्होंने एक विशिष्ट बात बताई है कि जयपुर निवासी आये दिन गोठ करते रहते थे, जिसमें चूरमा, दाल व बाटी बनते थे। राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन विभागाध्यक्ष शास्त्री कोसलेन्द्रदास के अनुसार जयवंश महाकाव्य में विद्याधर का बाग, रूपनिवास, सिसोदिया रानी का बाग और गलता में संतों की परंपरा का वर्णन है। मालीराम, जयराम, मनोरथ, गोविंदराम जैसे ज्योतिषियों के साथ कीर्तिनाथ पुंडरीक का उल्लेख भी इसमें है। 18वीं सदी के जयवंश महाकाव्य का प्रकाशन राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति मूर्धन्य विद्वान डॉ. गणेश शंकर महाजनी ने 1952 ईस्वी में करवाया था।

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