जानिए बसंत पंचमी में सरस्वती पूजन का मुहूर्त:करियर में प्रगति के लिए मातंगी रुप की करें आराधना, राहु–केतु के दोष से मिलेगी मुक्ति

बसंत पंचमी 2 व 3 फरवरी को मनाई जाएगी, 2 फरवरी की सुबह 9:14 की सुबह पुष्य नक्षत्र में शुरू होगी और 3 फरवरी की सुबह 6:56 तक मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक विद्या, बुद्धि की देवी माता सरस्वती का पूजन बीज व उप मंत्रों के साथ करें, साथ मां सरस्वती को गाय के दूध, कमल व गेंदा के फूल अर्पित करें। राहू-केतु को शांत करने को करें अनुष्ठान
ज्योतिषाचार्य डॉ. नीतिशा मल्होत्रा ने बताया-माता सरस्वती की पूजा का शुभ मुहूर्त 2 फरवरी को सुबह 9:15 से 12:35 बजे तक का समय है। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने और पीले पकवान खाने की परंपरा है, जो समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक है। विद्यार्थी इस दिन विद्या की प्राप्ति के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। राहु केतु से मिलने वाले सभी कष्टों से निवारण का सबसे प्रमुख दिन बसंत पंचमी होता है, क्योंकि उनकी अधिष्ठात्री देवी होने के कारण माँ सरस्वती की कृपा प्राप्त कर राहु केतु की महादशा राहु केतु से मिलने वाले सभी दोषों से मुक्ति मिलती है और राहू हमें शुभ फल प्रदान करते हैं। गन्ने के रस से करें अभिषेक
बसंत पंचमी के दिन बच्चों की विद्या प्रारंभ की जाती है, बच्चे पर मां सरस्वती की कृपादृष्टि बनी रहे इसके लिए पाटी पूजन करने के लिए सबसे पहले हल्दी, केसर, कुमकुम इत्र और गंगा जल का घोल बनाए और इससे कॉपी पर मां सरस्वती का बीज मंत्र या स्वास्तिक बनवाएं। माता सरस्वती को केसर युक्त मिष्ठान व खीर का भोग लगाएं, इसके साथ ही गन्ने के रस से पंचामृत से अभिषेक करना न भूले। तंत्र-मंत्र की देवी मां मातंगी
डॉ. नितिशा ने बताया- मां सरस्वती का एक स्वरूप मां मातंगी का भी है, जो एक तांत्रिक रूप है। जो तंत्र और मंत्रों की अधिष्ठात्री हैं। इन्हें विद्या, ज्ञान और संचार का प्रतीक माना जाता है। मातंगी माता का महत्व विशेष रूप से तंत्र साधना में होता है और इन्हें मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए पूजा जाता है। बताया कि प्रतियोगी परीक्षाओं व करियर में आगे बढ़ने के लिए मां के तांत्रिक रूप की पूजा करें, जो आपको नए आयामों पर पहुंचाएगी। इस विधि से करें मां मातंगी की पूजा
पूजन स्थल पर धूप और दीप जलाएं, मातंगी माता के मंत्रों का जाप “ॐ ह्लीं मातंगी स्वाहा” करें। काले तिल का सेवन और दान के साथ ⁠नीले रंग का भोजन ग्रहण करें, जैसे नीलमणी फल। पूजा के लिए स्वच्छ और शांत स्थान चुनें, पूजा स्थल पर कलश स्थापित करें। माता के मंत्रों का जाप करें। माता को दूध, दही, और शहद का अभिषेक करें। माता को मीठे व्यंजन का भोग अर्पित करें। मातंगी माता की उपासना विशेष रूप से पूर्णिमा और अमावस्या के दिन की जाती है। इन दिनों विशेष तंत्र साधनाएं करने का महत्व होता है। तंत्र साधना के लिए रात्रि का समय सबसे उत्तम माना जाता है।

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