भास्कर न्यूज | जालंधर मिट्टी का कटान रोकने और पूरा साल हरियाली कायम रखने वाली जियो मैटिंग टेक्नोलॉजी का जालंधर में पहली बार हाईवे प्रोजेक्ट पर प्रयोग हो रहा है। ये तजुर्बा सफल रहने के बाद नए हाईवे प्रोजेक्ट्स में इसका प्रयोग बढ़ सकता है। दिल्ली-अमृतसर-जम्मू-कटरा एक्सप्रेस वे यूं तो 670 किलोमीटर का है। लेकिन इसका जालंधर जिले में हिस्सा 90 किलोमीटर है। इस हाईवे के व्हीकल अंडरपास व पुल ग्राउंड से 18 फीट ऊंचे हैं। फिर इनके ऊपर लुक-बजरी की फ्लोरिंग व कंक्रीट स्लैब आती हैं। एक्सप्रेस वे की ऊंचाई ग्राउंड से सामान्य तौर पर 5.5 ऊंची होने के कारण इसके किनारों की ढलान पर जीयो मैटिंग की जा रही है। ये जूट की गद्दा नुमा शीट है। इसे मिट्टी के ऊपर बिछाकर घास लगाई जा रही है। इसे कुशा कहा जाता है। जालंधर में ये मै टिंग शाहकोट क्षेत्र में कर दी गई है। मौजूदा मानसून सीजन में जीयो मैटिंग के बीच लगे पौधे पल-बढ़ रहे हैं। इस तकनीक से बाकी हाईवे प्रोजेक्टों में भी वातावरण सरंक्षण का रास्ता खुल गया है। हाईवे अथॉरिटी अॉफ इंडिया के जानकार बताते हैं कि एक्सप्रेस वे के तटबंधों और ढलानों पर जीयो मैटिंग की दोनों साइडों को मिलाकर लंबाई 1300 किलोमीटर बनती है। वैसे पुलों के निर्माण में पॉलीमर के बनी शीटें मिट्टी की परत के बीच बिछाई जाती हैं। लेकिन इस बार मिट्टी व हरियाली के संरक्षण के लिए जूट की बनी मैटिंग का प्रयोग आरंभ किया गया है। गांव दीपेवाल में से गुजरते हाईवे पर जियो मैटिंग दिख रही है। बरसाती पानी के लिए कंक्रीट की खुली नालियां अलग से बनाई गई हैं। इससे एक्सप्रेस वे के किनारे के खेतों का भी बचाव हो जाएगा । इसलिए जियो मैटिंग का हो रहा इस्तेमाल 1. जियोमैट पर घास लगाई जाती है। जियो मैट जूट का बना होता है। इससे मिट्टी बरसाती पानी के साथ बहकर नीचे नहीं आती। 2. जिमयोमैट में पौधे व खास लगाई जाती है। मैट के कारण ये हरियाली बहने से नुकसान नहीं होता है। ढलान पर घास की बढ़ोतरी नियंत्रित हो जाती है। 3. बारिश का पानी हाईवे से बहकर जब किनारों की तरफ आता है तो जियो मैटिंग इसका प्रैशर सह लेता है। कंक्रीट फ्लोरिंग व बाकी चीजों का नुकसान नहीं होता है।


