जीवन में बेवजह के बोझ को छोड़ना सीखें:तनाव और पछतावे को छोड़ने से आत्मनिर्भर और इमोशनली मजबूत बनते; JIG में ‘छोड़ने की मौज’ पर चर्चा

जयपुर इंटलेक्चुअल ग्रुप (JIG) की बैठक जयपुर में की गई। बैठक का विषय “छोड़ने की मौज” रहा, जिस पर आज की तेज-रफ्तार और प्रतिस्पर्धात्मक जीवनशैली के बारे में चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में व्यक्ति अनावश्यक दबाव, अपेक्षाओं और तुलना के कारण मानसिक तनाव से घिरा रहता है। ऐसे में ‘छोड़ने की मौज’ का विचार समाज को संदेश देता है कि हर चीज़ को थामे रखना ही सफलता नहीं है, बल्कि अनावश्यक बोझ को छोड़ देना भी मानसिक शांति और संतुलन का मार्ग है। ‘छोड़ने की मौज’ का अर्थ हार मानना नहीं
चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि ‘छोड़ने की मौज’ का अर्थ हार मानना नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण चयन करना है। इसमें नकारात्मक सोच, बेवजह का तनाव, बीते हुए पछतावे और दूसरों की अपेक्षाओं को छोड़कर आत्म-विकास, सुकून और वर्तमान में जीने को प्राथमिकता दी जाती है। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और भावनात्मक रूप से सशक्त बनाता है। वक्ताओं ने बताया कि जब व्यक्ति अनावश्यक चिंताओं और हर चीज़ पर नियंत्रण की भावना को छोड़ देता है, तो उसकी रचनात्मकता, कार्यक्षमता और रिश्तों की गुणवत्ता में सुधार आता है। यह सोच न केवल व्यक्तिगत जीवन में, बल्कि कार्यस्थल और सामाजिक संबंधों में भी सकारात्मक बदलाव लाने में सहायक सिद्ध होती है। पीले फूलों से किया स्वागत
बैठक की मेजबानी कमला पोद्दार ने की, जिन्होंने सभी सदस्यों का पीले फूलों से स्वागत किया। बसंत पंचमी के अवसर पर सभी सदस्य पीले कपड़ों में उपस्थित हुए, जिससे कार्यक्रम में उत्सवपूर्ण और सकारात्मक वातावरण बना रहा। कार्यक्रम के प्रमुख वक्ताओं में विनोद भारद्वाज, तृप्ति पांडे, प्रेरणा और सपना महेश शामिल रहीं, जिन्होंने अपने अनुभवों और विचारों के माध्यम से विषय को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। आज के JIG कार्यक्रम में अलका बत्रा, अशोक राही, दीपा माथुर, देवराज सिंह, डॉ. निर्मला सेवानी, राजुला लूना, शशि माथुर, सुधीर कासलीवाल, सुधीर माथुर, डॉ. विद्या जैन, डॉ. मीता सिंह, डॉ. सरिता सिंह, निर्मला टीकू और रजनीश सिंघवी सहित कई सदस्य उपस्थित रहे।

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