जूनियर हॉकी एशिया कप जिताने वाली कप्तान का इंटरव्यू:ज्योति सिंह बोली- एक ही प्रेशर था कि टाईटल को बचाना है, फाइनल जीतना सपना जैसा

जूनियर हॉकी एशिया कप में भारत को जीत दिलाने वाली कप्तान ज्योति सिंह अपने घर झांसी पहुंच गई। वो कहती हैं कि मुझे सिर्फ एक ही प्रेशर था और वो टाईटल बचाने का था। क्योंकि लास्ट बार हम जीते थे और हमें ये बरकरार रखना था। हमने मैच खेले, अपनी कमियों को दूर किया। हर मैच में अपने इम्प्रूव किया। वहीं, विपक्षियों टीम से भिड़ने से पहले उनके वीडियो देखे। कमजोरी ढूंढ़कर रणनीति बनाई और वो रणनीति हमारी सफल होती गई। यही वजह से हम फाइनल जीते। स्वर्ण पदक लेकर घर पहुंची ज्योति सिंह ने अपनी मां और पिता को मेडल पहनाया। मां का कहना है कि मेरी बेटी ने हम सबका मान बढ़ाया है। मुझे लोग बेटी की वजह से पहचानने लगे हैं। घर से निकलती हूं तो लोग कहते है कि देखो ज्योति की मां जा रही है। इससे बड़ी खुशी और कुछ नहीं हो सकती है। दैनिक भास्कर ने ज्योति सिंह से खास बातचीत की। आइये पढ़ते हैं… सवाल- जब एशिया कप खेलने गई तो क्या प्लान बनाया था? जवाब- मेरी पूरी टीम का एक ही लक्ष्य था कि गोल्ड लेकर ही जाना है। हमारी टीम डे बाय डे अपोजिट टीम के हिसाब से रणनीति बनाती थी। हम अपनी कमजोरी को दूर करने की कोशिश करते थे। वीडियो देखते थे और विपक्षी टीम की कमजोरी पकड़ते थे। उसी के हिसाब से रणनीति बनाते थे, जो कारगर साबित होती थी। सवाल- फाइनल जीता, मैच के दौरान क्या सो रही थी? जवाब-देखिए, मैच के दौरान अप-डाउन होता रहता है। कभी हाफ में हम तो कभी हाफ में दूसरी टीम बढ़त बना लेती है। एक मैच 2-1 से चीन से हारे भी। उसमें हाफ टाइम तक हम लोग आगे थे। कभी ऐसा होता है कि अवसर हमारे पास होते हैं, मगर हम गोल नहीं कर पाते। वहीं, समय होता है टीम वर्क का। टीम अच्छा खेलती है तो रिजल्ट आता है। हर मैच में हमने अपने आपको इम्प्रूव किया। इसलिए फाइनल में जीतें। सवाल- फाइनल का प्रेशर बहुत होता है। कप्तान पर और ज्यादा, इसके लिए क्या किया? जवाब-कप्तानी का प्रेशर मुझे नहीं था। मगर एक प्रेशर जरूर था कि हमने बार ईयर जूनियर एशिया कप जीता था। इसलिए हमें उस टाइटल को अपने पास रखना था। उसको बचाना था। सवाल- घर आई तो क्या माहौल था, आगे क्या लक्ष्य है? जवाब-अब ताे टीवी और मोबाइल चल गए हैं। सब देख रहे होते हैं। सारे मैचे मेरे घरवालों ने देखे। फिर वीडियो बनाकर मुझे भेजे। मुझे तो बहुत खुशी थी, मगर उससे ज्यादा मेरे मम्मी-पापा और भाई खुश थे। क्योंकि, इन लोगों के सपोर्ट की वजह से यहां पहुंची हैं। आगे के बारे में बताऊं तो दिसंबर 2025 में जूनियर हॉकी वर्ल्डकप होने वाला है। पहला टारगेट है कि टीम जीते। फिर इंडिया सीनियर टीम में इंडिया के लिए खेलना मेरा लक्ष्य है। सवाल- आपने कैसे तय किया कि हॉकी खेलना है? जवाब-मेरा फैमिली बैकग्राउंड स्पोर्ट्स से रहा है। मेरी बुआ मधू एथलीट थी। पिता धीरज सिंह परिहार जो खुद इंटरनेशनल एथलीट थे। मैं 6 साल की उम्र से पिता के साथ ग्राउंड पर जाती थी और वहां जॉगिंग करती थी। मेरी बुआ की बेटी यानी मेरी कजन सिस्टर अनुजा सिंह हॉकी खेला करती थी। जब वो गर्मियों की छुट्‌टी में घर आती थी तो उनको देखकर मन होता था कि मैं भी हॉकी खेलूं। एक दिन मैंने डिसाइड कर लिया कि मुझे हॉकी खेलना है। जब मैंने बहन को बोल दिया। तब घरवाले तुरंत राजी हो गए। तब मेरी उम्र 12 साल थी। सवाल- 12 साल से हॉकी खेली, फिर कप्तान तक का सफर कैसे तय किया? जवाब-मेरी बहन अनुजा मध्य प्रदेश महिला हॉकी एकेडमी, जो ग्वालियर में है, वहां ट्रेनिंग करती थी। एक दिन बहन ने अपने कोच परमजीत बरार को मेरे बारे में बताया। कोच ने उनसे कहा कि ठीक है, लेकर आओ, देखते हैं। तब मुझे सिर्फ दौड़ना आता था। हॉकी स्टिक भी नहीं पकड़ पाती थी। रनिंग के बेस पर कोच ने मेरा सिलेक्शन कर लिया। मुझे स्टिक भी पकड़ना भी कोच ने सिखाया। सुबह से शाम तक प्रेक्टिक करती थी। फिर मैने पीछे मुड़कर नहीं देखा और खेलते हुए आगे बढ़ती चली गई। पहले जूनियर नेशनल खेले, फिर जूनियर इंडिया कैंप के लिए सिलेक्शन हो गया। लास्ट ईयर से जूनियर हॉकी टीम की कप्तान हूं। सवाल- कप्तान कैसे चुनी गई? जवाब-जब कप्तानी मिलती है तो प्लेयर के अंदर सारे गुण देखे जाते हैं। उसमें लीडरशिप क्वालिटी है या नहीं। क्या वो टीम को संभाल सकती हैं? गेम कैसा है? मुझे लगता है कि मेरे कोच ने मुझमें वो देखा होगा, इसलिए कप्तानी मिली। सवाल- युवाओं को क्या संदेश देना चाहती हैं? जवाब- जो मेरे बराबर के हैं या छोटे हैं। मैं उनसे कहना चाहती हूं कि आप स्पोट्स चुन रहे हैं या पढ़ाई या आप कुछ भी कर रहे हैं। जो भी आपको पेशन है, उसको आप पूरी डेडीकेशन के साथ करिए। यानी उसमें 100 प्रतिशत दीजिए। जो भी टारगेट है, उसको दिमाग में रखकर काम करेंगे तो सफलता जरूर मिलेगी। मां बोली- बेटी की वजह से लोग हमें जानने लगे ज्योति सिंह की मां माधुरी का कहना है कि एशिया कप जीतकर बेटी गोल्ड लेकर घर आई है। मैं बहुत खुश हूं। गौरवान्वित महसूस कर रही हूं कि आज बेटी की वजह से हमें लोग जान रहे हैं। कहीं जाए तो कहते हैं कि ज्योति की मम्मी, ज्याेति के पापा आए हैं। ये बहुत खुशी का पल होता है। मैं मानती हूं कि बेटियां बिल्कुल भी बेटों से कम नहीं हैं। बेटियों पर बाउंडेशन नहीं रखनी चाहिए। जो करना चाहे, उन्हें करने देना चाहिए। वो हर एक काम कर सकती हैं, जो एक बेटा कर सकता है। उसी का नतीजा है कि आज मेरी बेटी ने हमारा मान बढ़ाया है। ज्योति की मां सरकारी स्कूल में टीचर हैं। बड़ा भाई भानु प्रताप सिंह कॉम्पिटिशन की तैयारी कर रहा है।

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