रा.वन, मुल्क, आर्टिकल-15 और थप्पड़ जैसी दर्जनों फिल्मों के डायरेक्टर अनुभव सिन्हा इन दिनों एक खास यात्रा पर निकल पड़े हैं। उन्होंने इस सफर का नाम दिया है “चल पिक्चर चलें”। अपनी इस यात्रा में अनुभव अलग-अलग शहरों और कस्बों में जाकर लोगों से फिल्मों को लेकर बातचीत कर रहे हैं। इस सफर की कड़ी में रायपुर पहुंचे अनुभव सिन्हा ने इस दौरान दैनिक भास्कर से इस दौरान उन्होंने, जेंडर डिस्पैरिटी, नेपोटिज्म, छोटे-बड़े शहरों की सोच में फर्क पर और अपनी यात्रा को लेकर खास बातचीत की। उन्होंने कहा कि फिल्में समाज का आइना तो बनती हैं, पर बदलाव के लिए लंबे समय तक गंभीर विमर्श की आवश्यकता है। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…… सवाल- यात्रा इंसान को बहुत कुछ सिखाती है। 14 शहरों की यात्रा में आपका अब तक का अनुभव कैसा रहा? जवाब – इस यात्रा में बहुत कुछ हो रहा है। मैं नए लोगों से मिल रहा हूं, नए शहरों में जा रहा हूं। एक अजीब सी समानता है और एक अलग सी डाइवर्सिटी भी। मुझे कुल 40 शहरों में जाना है। जब यह पूरा कर लूंगा, उसके बाद आप भी देखेंगे और मैं भी समझूंगा कि मेरे सिनेमा में क्या बदलाव आया है। सवाल- जब लोगों से मुलाकात होती है, वह अनुभव कैसा होता है? जवाब – हिंदुस्तान में मेहमान का स्वागत करने का तरीका हर प्रदेश में एक जैसा है। अतिथि को देखते ही लोग अच्छे से स्वागत करते हैं। खिलाने से लेकर हर चीज में बहुत अपनापन है। हालंकि हर अलग-अलग शहरों की जियो-पॉलिटिकल सिचुएशन अलग है, लेकिन कई चीजें एक जैसी ही हैं। यही वजह है कि इतनी डाइवर्सिटी होने के बावजूद इतना बड़ा देश एक बना हुआ है। सवाल -आपने ‘आर्टिकल 15’ में समाज में मौजूद भेदभाव दिखाया, लेकिन लोग सिनेमा हॉल से निकलते ही सब भूल जाते हैं और जातिवाद जैसी चीजें वैसी ही बनी रहती हैं? जवाब – सिर्फ एक फिल्म देखकर लोग नहीं बदल सकते। मैंने ‘थप्पड़’ बनाई है जिसमें जेंडर डिस्पैरिटी दिखाई गई, लेकिन क्या मेरे अंदर यह खत्म हो गई? मैं खुद भी इन चीजों से जूझता हूं। यह ऐसे विषय हैं जिन पर लंबे समय तक बात करने की जरूरत है। सिर्फ सिनेमा ही नहीं, संगीत, साहित्य और हर कला में इन बातों पर चर्चा होनी चाहिए। हमारे समाज में कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर गंभीर और लंबा विमर्श जरूरी है। सवाल-आपकी यात्रा में छोटे शहर और बड़े शहर के लोगों में क्या अंतर दिखा? जवाब – छोटे शहर के लोग कई चीजों में ज्यादा अवेयर है। साहित्य, राजनीति, इतिहास, भूगोल… हर विषय पर बात करते हैं। हम बड़े शहरों में इतने उलझे रहते हैं कि इतिहास, भूगोल और फूड पर बात करना भी मुश्किल हो जाता है। मेरे घर से दफ्तर तक पहले 11 मिनट लगते थे, अब 3 साल में बढ़कर 27 मिनट हो गए हैं। जिंदगी इतनी व्यस्त हो गई है कि हम इन बातों पर चर्चा ही नहीं कर पाते। सवाल-क्या बॉलीवुड में जेंडर डिस्पैरिटी है? जवाब – यह पूरी दुनिया जेंडर डिस्पैरिटी से भरी है हमारा देश और समाज भी। लेकिन लोग इसे सिर्फ बॉलीवुड में क्यों देखते हैं? बॉलीवुड में हमेशा महिलाओं ने अपनी आवाज उठाई है। अगर आपको लगता है कि भारत पीछे है, तो पहले अमेरिका में किसी महिला को राष्ट्रपति बनाकर दिखा दीजिए। वहां भी इसे होने में कई साल लग जाएंगे। सवाल- आपकी फिल्मों में असहज सच दिखता है। क्या इस तरह की फिल्म बनाने का कोई दबाव रहता है? जवाब – मैं फिल्मों को इस सोच से नहीं चुनता कि यह असहज सच है इसलिए इसे बनाना चाहिए। जिन बातों से मैं खुद असहज होता हूं, जिनका कारण मैं समझ नहीं पाता। वही विषय मुझे ज्यादा आकर्षित करते हैं। जैसे लोग कह रहे हैं कि छोटे शहरों में लोग फिल्में नहीं देख रहे। तो इसे समझने के लिए मुझे यात्रा करनी पड़ेगी, 40 शहरों में जाना पड़ेगा। उसी समझ की तलाश में मैं इस यात्रा पर निकला हूं। कहानियों की ओर भी मैं ऐसे ही आकर्षित होता हूं। सवाल- AI सिनेमा के लिए कोई चुनौती नहीं है? जवाब – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिनेमा के लिए कोई चुनौती नहीं है। यह सिर्फ ट्रेडिंग क्वेश्चंस हैं। AI ने सिनेमा के लिए आज तक क्या किया है, यह बताइए… फिर मैं बताऊंगा कि यह चुनौती है या नहीं। सवाल-नेपोटिज्म को लेकर आपका क्या कहना है? जवाब – नेपोटिज्म का मतलब है रिश्ते के कारण कोई अनडिजर्विंग फायदा लेना। लोग इसे सिर्फ बॉलीवुड में देखते हैं, लेकिन आज कौन-सा क्षेत्र इससे अछूता है? ऑयल इंडस्ट्री से लेकर राजनीति तक हर फील्ड में यह मौजूद है। सवाल- नए फिल्ममेकर्स को आप क्या मैसेज देना चाहेंगे? जवाब – बस काम करते रहिए, फिल्में बनाते रहिए। इस काम का कोई हाईवे नहीं है। आदमी पगडंडियों से ही पहुंचता है और अपनी पगडंडियां खुद बनानी चाहिए। मैंने जब तय किया कि मुझे फिल्में बनानी हैं, तो मैंने बोरिया-बिस्तर उठाया और मुंबई चला गया। तब से लेकर आज तक मैं जूझ ही रहा हूं और तैरना सीख रहा हूं।


