जैसलमेर के तगा राम भील को ‘पद्मश्री’:पिता के अलगोजा से करते थे प्रैक्टिस, पहली बार 1981 में मरू महोत्सव में दी थी परफॉर्मेंस

गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक ‘पद्म पुरस्कारों’ की घोषणा कर दी है। इस सूची में राजस्थान के जैसलमेर जिले के प्रसिद्ध अलगोजा वादक तगाराम भील का नाम शामिल है। 62 वर्षीय तगाराम को कला के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान और मरुधरा की पारंपरिक वादन शैली को वैश्विक स्तर पर जीवित रखने के लिए पद्मश्री (2026) से नवाजा जाएगा। तगाराम जैसलमेर के मूलसागर गांव के रहने वाले हैं। पिता घर में नहीं होते तो चुपके से अल्गोजा निकाल कर प्रैक्टिस करते थे और महज 10 साल की उम्र में उन्होंने इसमें महारत हासिल कर ली। 11 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला अल्गोजा खरीदा और फिर अपने सफर की शुरुआत की। 15 देशों में गूंजी थार की धड़कन 1981 में जैसलमेर के मरु महोत्सव से शुरू हुआ उनका मंच प्रदर्शन का सफर 1996 में फ्रांस तक पहुंचा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अमेरिका, रूस, जापान और अफ्रीका सहित 15 से अधिक देशों में राजस्थानी लोक संगीत का परचम फहराया। तगा राम की सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बावजूद वे आज भी जीविका के लिए खनन (माइनिंग) कार्य से जुड़े हैं। वे केवल एक वादक ही नहीं, बल्कि एक कुशल शिल्पकार भी हैं; वे अपने हाथों से अलगोजा तैयार करते हैं, जिनकी मांग दुनिया भर में है। सम्मान का महत्व
पद्मश्री की इस घोषणा से जैसलमेर के कला जगत में हर्ष का माहौल है। यह सम्मान न केवल तगा राम भील की व्यक्तिगत साधना का फल है, बल्कि राजस्थान की उन दुर्लभ लोक कलाओं की जीत है जो आधुनिकता के दौर में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसे पहले जैसलमेर के हमीरा गांव के कमायचा वादक साकर खान व बईया गांव के निवासी लोक कलाकार अनवर खान को पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका है।

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