झाबुआ जिले के आदिवासी क्षेत्रों में विश्व मृदा दिवस पर वागधारा संस्था ने मृदा संरक्षण को लेकर अभियान चलाया। इस अभियान में संवाद, रैलियां और प्रतीकात्मक ‘मिट्टी पूजन’ आयोजित किए गए, जिसमें ग्रामीणों ने मिट्टी को ‘माँ’ मानते हुए उसकी जीवंतता बनाए रखने का संकल्प लिया। यह पहल विशेष रूप से पेटलावद ब्लॉक में प्रभावशाली रही। 50 गावों में 3000 से अधिक लोगों ने लिया भाग खाखरापाड़ा, करनगढ़, कैशरपुरा, मोईचारनी और मुल्थनिया सहित लगभग 50 गांवों में 3000 महिला, पुरुष और बच्चों ने सक्रिय भागीदारी की। ग्रामीणों ने मृदा स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक खेती के महत्व पर सामूहिक चर्चा की। मिट्टी की आरती, रैलियां और गांव-स्तरीय गोष्ठियों के माध्यम से सदियों पुराने पारंपरिक मृदा संरक्षण के तरीकों को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया गया। ग्रामीणों ने मिट्टी के बिगड़ते स्वास्थ्य पर चिंता जताई कार्यक्रम में उपस्थित ग्रामीणों ने स्वीकार किया कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों, खरपतवार नाशकों, असंतुलित वैज्ञानिक खेती और लगातार मृदा शोषण के कारण मिट्टी की उर्वरता तेजी से घट रही है। उन्होंने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि खेतों को खाली छोड़ने, जैविक खाद का उपयोग और प्राकृतिक कृषि पद्धतियां अपनाकर मिट्टी को पुनः पोषित किया जाएगा। सामुदायिक और पारंपरिक खेती को बढ़ावा वाग्धारा ब्लॉक सहजकर्ता मुकेश पोरवाल ने कहा, “मृदा भोजन उत्पादन, जलवायु संतुलन और पारिस्थितिकी तंत्र की आधारशिला है।” यूनिट लीड धर्मेंद्र सिंह चुंडावत ने पारंपरिक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को रासायनिक खेती और जलवायु परिवर्तन से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय बताया। ग्राम स्वराज समूह के सदस्यों ने गाँव-गाँव जाकर समुदाय को जोड़कर इस पहल को मजबूत बनाया। यह रहे उपस्थित कार्यक्रम में रमतु डामोर, हुर्रा भाभर, नानियां डामोर, प्रभु डामोर, राजू डामोर, अनिता गामड, गणेश पारगी, लीलावती सिंगाड, दीपक मईडा, ललिता कटारा और प्रेमलता डामोर सहित कई ग्रामीणों ने भाग लिया और मिट्टी संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया। इस पहल से आदिवासी समुदाय ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पारंपरिक खेती के महत्व को बताते हुए मृदा संरक्षण की दिशा में एक सशक्त संदेश दिया।


