झारखंड अलग राज्य बने 25 साल हो गए। लेकिन अभी भी यहां बिहार भूमि सुधार अधिनियम-1973 ही लागू है। बिहार ने इस कानून को अप्रासंगिक मानते हुए 2009 के बाद इसमें एक दर्जन से अधिक संशोधन किया। ऑनलाइन म्यूटेशन और लगान के प्रावधान को जोड़ा। लेकिन झारखंड में ऐसा कुछ नहीं हुआ। न तो अपना कानून बनाया, न ही इसमें संशोधन किया। यहां बिना नियम बनाए ही ऑनलाइन म्यूटेशन और लगान का काम चल रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर मामला कोर्ट पहुंचा तो ऑनलाइन म्यूटेशन और लगान को गैरकानूनी घोषित किया जा सकता है। क्योंकि झारखंड में ऑनलाइन म्यूटेशन और लगान जैसे काम के लिए कोई कानूनी आधार ही नहीं है। 2020 में विधेयक का प्रारूप बना, पर विधानसभा में पेश ही नहीं हुआ वर्ष 2020 में झारखंड भूमि दाखिल खारिज विधेयक लाने की कोशिश की गई थी। विधेयक के प्रारूप को कैबिनेट से मंजूरी मिल गई थी। इसमें मऑनलाइन होल्डिंग, म्यूटेशन और लगान आदि का प्रावधान किया जा रहा था। विधेयक में राजस्व पदाधिकारियों के कामों को क्वासी ज्युडिशियल मानने का प्रावधान जोड़ा गया। लेकिन इसे विधानसभा में पेश ही नहीं किया गया। क्योंकि पता चला कि झारखंड के किसी भी काश्तकारी अधिनियम में राजस्व पदाधिकारी के आदेश को क्वासी ज्युडिशियल मानने का प्रावधान नहीं है। इसके बाद बिना नियम बनाए ही ऑनलाइन म्यूटेशन व लगान जमा करने की व्यवस्था लागू कर दी। नियमावली में तत्काल सुधार जरूरी बिना नियम बने ही चल रहे ऑनलाइन म्यूटेशन और लगान पर सवाल उठ सकता है। अभी जो अॉनलाइन नामांतरण (म्यूटेशन) की प्रक्रिया है, उसको विधि सम्मत बनाने के लिए सरकार को अविलंब नामांतरण अधिनियम में या नियमावली में सुधार करना चाहिए। बिहार ने वर्ष 2017 में ही नामांतरण नियमावली में संशोधन कर दिया था। लेकिन झारखंड में संभवतः नई नामांतरण नियमावली में बदलाव के चक्कर में ऐसा बदलाव नहीं हो सका। बिहार ने 2009 में भूमि विवाद निराकरण अधिनियम बनाकर अभिलेख, चौहद्दी, इंट्री, रैयती भूमि का गैरकानूनी दखल आदि के समाधान का अधिकार डीसीएलआर, डीएम व प्रमंडलीय आयुक्त को दिया। लेकिन झारखंड में अभी इसकी प्रक्रिया चल रही है। बिहार ने 2009 में नया भूमि न्यायाधिकरण अधिनियम बनाया। इसमें हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज अध्यक्ष व जिला जज सदस्य हैं। झारखंड में ऐसे मामले काफी तादाद में हैं। लेकिन यहां न तो ऐसा अधिनियम बना और न ही कोई न्यायाधिकरण। बिहार में म्यूटेशन और संबंधित कामों के लिए पहले भूमि दाखिल खारिज अधिनियम 2011 बना। 2017 में ऑनलाइन के लिए प्रावधान किया। फिर सिस्टम शुरू किया गया। जबकि झारखंड में अविभाजित बिहार के समय बना टिनेंसी होल्डिंग (मेंटेनेंस ऑफ लैंड रिकॉर्ड्स) एक्ट 1973 चल रहा है। वैसे कई जिलों में रजिस्ट्री के बाद म्यूटेशन के कागजात सीओ ऑफिस ऑनलाइन ट्रांसफर करने की व्यवस्था लागू की गई है। बिहार ने 2011 में विशेष सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त अधिनियम बनाया। सैटेलाइट व अन्य साइंटिफिक सिस्टम और सक्षम प्राइवेट एजेंसियों से भी सर्वे कराने का कानूनी प्रावधान कर दिया। लेकिन यहां चेन विधि से ही सर्वे को मान्यता है। – डॉ. सुनील कुमार सिंह, रिटायर्ड सचिव


