नई शिक्षा नीति-2020 के तहत स्किल डेवलपमेंट और वोकेशनल एजुकेशन को भविष्य की जरूरत बताया जा रहा है। छात्रों को न केवल किताबी ज्ञान, बल्कि व्यावहारिक कौशल भी दिया जा रहा है। लेकिन झारखंड में जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। दैनिक भास्कर ने रांची, जमशेदपुर और धनबाद के करीब 50 सरकारी स्कूलों की पड़ताल की तो पता चला कि नौवीं से 12वीं तक के वोकेशनल कोर्स के हजारों बच्चे पूरे सत्र बिना किताबों के ही पढ़ाई कर रहे हैं। जबकि फरवरी में झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) इनकी बोर्ड परीक्षा लेगा। हालात ऐसे हैं कि कुछ स्कूलों में आंशिक रूप से किताबें मिलीं तो कई स्कूलों में पूरा साल बीतने के बाद भी एक भी किताबें नहीं पहुंची। ऐसे में छात्रों की तैयारी फोटो कॉपी, पुरानी किताबों और शिक्षकों के निजी संसाधनों पर टिकी है। जिन कोर्स को छात्रों को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम माना गया था, वही कोर्स आज व्यवस्था की लापरवाही की भेंट चढ़ गया है और छात्रों के लिए सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है। जैसे-जैसे परीक्षा नजदीक आ रही है, उनका तनाव भी बढ़ता जा रहा है। इन वोकेशनल कोर्स की पढ़ाई कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी-सक्षम सेवाएं, मीडिया और मनोरंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं हार्डवेयर, रिटेल, ब्यूटी और वेलनेस, पर्यटन और आतिथ्य, परिधान, हेल्थकेयर, और मल्टी-स्किल। तीन स्कूलों के हालात से समझिए… कैसे पढ़ाई कर रहे बच्चे


