झारखंड में 100 से अधिक जैव विरासत स्थल, उनमें 4 रांची में; 200 साल पुराने वृक्ष हैं खास

पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय क्षरण व जैव विविधता की हानि बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। तेज औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई, प्रदूषण व प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन से जैव विविधता की हानि हो रही है। इसके संरक्षण और जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 22 मई को ‘जैव विविधता दिवस’ मनाया जाता है। इस बार की थीम ‘प्रकृति के साथ सामंजस्य व सतत विकास’ है। प्रकृति के साथ सामंजस्य का अर्थ है मनुष्यों और प्राकृतिक दुनिया के बीच एक सम्मानजनक और संतुलित संबंध। मनुष्य पृथ्वी की पारिस्थितिकी का हिस्सा है, इसलिए मनुष्य का कर्तव्य है कि वह जैव विविधता को संरक्षित करे व सभी जीवों की रक्षा करे। आदिवासी समुदाय आज भी प्राकृतिक चक्रों का सम्मान करते हुए, अपने उपभोग को सीमित रखे हैं और पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करके सतत जीवन जी रहे हैं। 1987 में ब्रंटलैंड रिपोर्ट में कहा गया, ‘ऐसा विकास हो जो वर्तमान की आवश्यकताओं को इस तरह पूरा करे कि भविष्य की पीढ़ियां भी अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।’ लाह, तसर सिल्क, मधु, बांस को जीविकोपार्जन के लिए संरक्षित करेंगे छह महीने से झारखंड में बायोडायवर्सिटी बोर्ड कई अभियान शुरू किए हैं। भारतीय वनस्पति संस्थान कोलकाता व भारतीय जंतु संस्थान देहरादून की सहायता से यहां के जैव विविधता का चिह्निकरण किया जा रहा है। कॉलेज, यूनिवर्सिटी व अन्य संस्थानों के साथ मिलकर जैव विविधता के संरक्षण पर कार्यशाला तथा प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया है। स्टूडेंट्स के लिए इंटर्नशिप व सर्टिफिकेट कोर्स जल्द प्रारंभ होंगे। लाह, तसर, मधु, बांस की प्रजातियों के संरक्षण कर जीविकोपार्जन में संतुलित उपयोग का प्रशिक्षण दे रहे हैं। संजीव कुमार ने बताया कि झारखंड जैव विविधता पर्षद ने जीव-जंतुओं को संरक्षित और सुरक्षित बनाने के लिए राज्य में सौ से अधिक जैव विविधता विरासत स्थल (बीएचएस) चिह्नित किए हैं। रांची में ऐसे 4 बीएचएस हैं, जो अनगड़ा प्रखंड के चतरा गांव में हैं। रांची से 20 किलोमीटर दूर चतरा पंचायत महिलौंग रिंग रोड में स्थित है। यहां के सरना स्थल में विचित्र वृक्ष है, जिसमें बढ़ साल व करम एक साथ विगत 200 साल से जीवित हैं। यह सरना स्थल 5 हेक्टेयर में फैला है। वहां से 2 किमी दूर बुढ़वा महादेव है, जहां बहुत ही घना जंगल है, झरने भी हैं। यहां साल, महुआ, करम बीजों का संरक्षण होता है। बढ़ साल व करम वृक्ष 200 साल से साथ खड़े हैं
संजीव कुमार पीसीसीएफ व सदस्य सचिव झारखंड जैव विविधता पर्षद, रांची

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